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बुधवार, अप्रैल 18, 2012

आप सभी की जानकारी के लिए/सूचनार्थ/इन्फोर्मेशन---


मित्रों...आप सभी की जानकारी के लिए/सूचनार्थ/इन्फोर्मेशन---

आजाद/स्वतंत्र भारत की कुंडली के अनुसार आने वाले दो (02) वर्ष भारत( इण्डिया ) एवं उसके पडोसी देशों/मित्र राष्ट्रों के लिए ठीक/अच्छे नहीं रहेंगे...

ऐसा मेरा मानना/वक्तिगत सोच/विचार हें..
.
आगामी अमावस्या ( 21  अप्रेल  ,2012 ) निर्मित होने वाले ऐसे अनेक योग बन रहे हें जिनके कारण इस आगामी समयावधि में इस देशों  में प्राकृतिक आपदा जैसे --भूकंप,आगजनी,सुनामी,भारी वर्षा/बाढ़ अकाल/सुखा आदि की संभावनाएं बन रही हें

इसी के साथ साथ मानव निर्मित सम्सयायें भी सर उठाएंगी..
जैसे---राजनितिक परिवर्तन/सत्ता परिवर्तन...जनता का विद्रोह/आक्रोश...नरसंहार...बम विस्फोट/हड़ताल..अनेक प्रकार की दुर्घटनाएं...के होने/घटने की पूर्ण संभावनाएं बन रही हें ..

वर्ष 2012 से वर्ष 2020 की इस अवधि में भारत अखंड ( लगभग 200 वर्ष की स्थिति) में भी आ सकता हें ...

ऐसा चमत्कार भी संभव होने की पूरी-पूरी संभावना बन रही हें...
आप क्या सोचते हें ...??? आप सभी ज्योतिषी  बंधुओ से आग्रह की वे भी अपने-अपने विचार/सोच/दृष्टिकोण से  मुझे अवगत करवाएं...        .
ऐसी प्रार्थना ...भगवान से....
सदेव आपका अपना---
स्वामी विशाल चैतन्य(पंडित दयानंद शास्त्री )
मोब.—-09711060179(DELHI),
Mob.No.-09024390067(RAJ.),

शुक्रवार, मार्च 30, 2012

शनि दोष निवारण हेतु कुछ उपाय/तरीके----


मित्रों कल शनिवार  हें....आप सभी की जानकारी / ज्ञानवर्धन हेतु शनि दोष   निवारण हेतु कुछ उपाय/तरीके निम्न हें ध्यान से विधिपूर्वक संपन्न करें---
सभी राशियों के लिये शनि देव को शांत और प्रसन्ना करने के लिए के निम्न 11   उपाय इस प्रकार से है----

 आशा करता हूँ की जिस भाई-बहन की कुंडली में शनिदेव के साढ़े सत्ती या शनि महादशा चल रही हो उनके लिए कल्याणकारी होगी..

उपाय इस प्रकार से है —

ॐ शनैश्वराय नमः॥,ॐ शनैश्वराय नमः॥,ॐ शनैश्वराय नमः॥

१- शनिवार को हनुमान मन्दिर में पूजा उपासना कर तथा प्रसाद चढायें.
शनि देव को शांत करने के लिए वेदों में प्रायः हनुमान जी की पूजा बताए गई है , अगर इन्शान हनुमान जी की पूजा करे तो शनि अपने आप ही शांत रहता है
२-शनिवार को सरसों के तेल में अपनी छाया देख कर दान करना चाहिए
३ -मध्यमा अंगूली में काले घोडे की नाल का छल्ला धारण करें.
४- घर में पूजा स्थान में पारद शिवलिंग रखें. तथा उसके सामने प्रतिदिन महामृ्त्त्युंजय मंत्र का जाप कर्रें.
५- स्वास्तिक अथवा अन्य मांगलिक चिन्ह घर के मुख्य द्वार पर लगायें.
६- शनि स्तोत्र का प्रतिदिन श्रद्धापूर्वक जाप करें.
७- काले घोडे की नाल की अंगूठी शनिवार को मध्यमा अंगुळी में धारण करें.
८ – प्रतिदिन शनि महा मंत्र का जाप करने से घर में सुख शांति रहती है और शनि देव सभी मनोरथ को पूरा करते है मंगलमय वातावरण बना रहता है ,
९- शनिवार के दिन नारियल अथवा बादाम को जल प्रवाह करें.
१०- शनिवार को साबुत उडद किसी भिखारी को दान करें.या पक्षियों को ( कौए ) खाने के लिए डाले ,
११- पीपल के पेड पर जल चढायें.या हनुमान जी को मंगल और शनिवार के दिन सिंदूर चढ़ाएं

दशरथकृत शनि स्तोत्र----

नम: कृष्णाय नीलाय शितिकण् निभाय च।
नम: कालाग्निरूपाय कृतान्ताय च वै नम: ॥1॥
नमो निर्मांस देहाय दीर्घश्मश्रुजटाय च ।
नमो विशालनेत्रय शुष्कोदर भयाकृते॥2॥
नम: पुष्कलगात्रय स्थूलरोम्णेऽथ वै नम:।
नमो दीर्घायशुष्काय कालदष्ट्र नमोऽस्तुते॥3॥
नमस्ते कोटराक्षाय दुख्रर्नरीक्ष्याय वै नम: ।
नमो घोराय रौद्राय भीषणाय कपालिने॥4॥
नमस्ते सर्वभक्षाय वलीमुखायनमोऽस्तुते।
सूर्यपुत्र नमस्तेऽस्तु भास्करे भयदाय च ॥5॥
अधोदृष्टे: नमस्तेऽस्तु संवर्तक नमोऽस्तुते।
नमो मन्दगते तुभ्यं निरिस्त्रणाय नमोऽस्तुते ॥6॥
तपसा दग्धदेहाय नित्यं योगरताय च ।
नमो नित्यं क्षुधार्ताय अतृप्ताय च वै नम: ॥7॥
ज्ञानचक्षुर्नमस्तेऽस्तु कश्यपात्मज सूनवे ।
तुष्टो ददासि वै राज्यं रुष्टो हरसि तत्क्षणात् ॥8॥
देवासुरमनुष्याश्चसि विद्याधरोरगा:।
त्वया विलोकिता:सर्वे नाशंयान्ति समूलत:॥9॥

शनि मंत्र----
कोणस्थ: पिंगलो बभ्रु: कृष्णौ रौद्रोंतको यम: l
सौरी: शनिश्चरो मंद:पिप्पलादेन संस्तुत: l
नमस्ते कोणसंस्थाय पिंगलाय नमोस्तुते l
नमस्ते रौद्रदेहाय नमस्ते चांतकायच l
नमस्ते मंदसंज्ञाय नमस्ते सौरयेविभो l
नमस्ते यमसंज्ञाय शनैश्चर नमोस्तुते l
प्रसादं कुरु देवेश: दीनस्य प्रणतस्यच ल

शनि स्त्रोत्-----
निलान्जनम समाभासं रविपुत्रं यमाग्रजम।
छायामार्तंड संभूतं तं नमामि शनैश्चरम॥
सूर्य पुत्रो दीर्घ देहो विशालाक्षः शिवप्रियः।
मन्दचारः प्रसन्नात्मा पीडां हरतु मे शनिः ॥
कोणस्थ पिंगलो ब्रभू कृष्णो रौद्रो दंतको यमः।
सौरिः शनैश्वरो मन्दः पिप्पालोद्तः संस्तुतः॥
एतानि दशनामानी प्रातः रुत्थाय य पठेतः।
शनैश्वर कृता पिडा न कदाचित भविष्यती॥
आप अपनी कुंडली दिखाकर भी शनिदेव की दशा महादश या शनि दोष के बारे में जानकारी प्राप्त करने हेतु संपर्क करें----

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Thank  you very much .
स्वामी विशाल चैतन्य (पंडित दयानन्द शास्त्री ) 
Mob.--

---09411190067(UTTARAKHAND);;


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सोमवार, मार्च 26, 2012

नवरात्री का नारी और महिलाएं पर प्रभाव ....कब और कैसे करें नवरात्री उद्यापन ..???


नवरात्री का नारी और महिलाएं पर प्रभाव

(नवरात्री का  नारी और महिलाएं से  सम्बन्ध)----

कब और कैसे करें नवरात्री उद्यापन  ..???

हम सभी मां भगवती के पावन पर्व नवरात्र महोत्सव को सदियों से मानते आ रहे  है। नवरात्रों के दौरान भारत की धरती मां अंबे के जयकारों से गूंज उठती है। स्त्रियां इस दौरान अपने परिवार सहित इन पावन नवरात्रों के दिन मां शक्ति की पूजा-आराधना करती हैं। वैसे तो नवरात्र साल में चार होते हैं, पर इनमें आश्विन शुक्ल प्रतिपदा से नवमी तक (शारदीय नवरात्र) और चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से रामनवमी तक (वसंत नवरात्र) को ही प्रमुख माना गया है। दो गुप्त नवरात्र होते हैं, जिनका प्रचलन कुछ खास नहीं है। ये गुप्त नवरात्र क्रमश: आषाढ़ और माघ मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से नवमी तक होते हैं। ये चारों नवरात्र हमारे चार पुरुषार्थ धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के प्रतीक बन सकते हैं। अक्सर गृहस्थ जीवन की व्यस्त दिनचर्या में दो सर्वमान्य नवरात्र ही हमें महत्वपूर्ण लगते हैं। 
कुंवारी कन्याओं के नाम के आगे "कुमारी" और विवाहित महिलाओं के नाम में "देवी" शब्द जोड़कर हमारी वैदिक संस्कृति ने स्पष्ट किया था कि प्रत्येक नारी देदीप्यमान ज्योतिर्मय सत्ता है। तभी तो अष्टमी और नवमी को घर-घर में देवी की पूजा सिर्फ कन्या के रूप में होती है। वह देवी ही हमें मां के रूप में जन्म देती है। पत्नी के रूप में सुख और पुत्री बनकर आनंद का प्रसाद बांटती है। 
धरती पर जब देवी स्वरूप धारण कर उतरती है, तो वह प्रकृति में सबसे निराला, कोमल तथा बेजोड़ स्वरूप होता है। चरणों में कुंकुम लगाए और नूपुर झंकार की मधुर ध्वनि सुनाती देवी का धरती पर साक्षात अवतरण है-नारी। स्त्री में तेज और दीप्ति की प्रमुखता है। इसी से हमारे यहां नारी के नाम में "देवी" शब्द जोड़ा जाता है। आजकल नई पीढ़ी की महिलाएं अपने नाम के आगे "देवी" शब्द लगाना भले ही पसंद न करती हो, पर है यह बड़ा ही अर्थ-गंभीर और महिमामय शब्द। देवी स्वयं कहती है कि "पृथ्वी पर सारी çस्त्रयों में जो भी सौभाग्य, सौंदर्य है, वो पूरी तरह से मेरा ही है।" तभी तो अष्टमी और नवमी को हम कन्याओं के पग पखारते हैं, उन्हें दक्षिणा देते हैं, लेकि नवही लक्ष्मी और सरस्वती-स्वरूपिणी कन्या जब हमारे घर कोख में उतरती है तो अवतार लेने से पहले हम उसे नष्ट कर डालते हैं! क्या यही है दुर्गा पूजा और हमारी श्रद्धा का सत्य? 

सृष्टि की जननी----
शास्त्र कहते हैं कि आदिशक्ति का अवतरण सृष्टि के आरंभ में हुआ था। कभी सागर की पुत्री सिंधुजा-लक्ष्मी तो कभी पर्वतराज हिमालय की कन्या अपर्णा-पार्वती। तेज, द्युति, दीप्ति, ज्योति, कांति, प्रभा और चेतना तथा जीवन शक्ति संसार में जहां कहीं भी दिखाई देती है, वहां देवी का ही दर्शन होता है। ऋषियों की विश्व-दृष्टि तो सर्वत्र विश्वस्वरूपा देवी को ही देखती है, इसलिए माता दुर्गा ही महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती के रूप में प्रकट होती है। देवीभागवत में लिखा है कि देवी ही ब्रह्मा, विष्णु तथा महेश का रूप धर संसार का पालन और संहार करती हैं। देवी सारी सृष्टि को उत्पन्न तथा नाश करने वाली परम शक्ति है। देवी ही पुण्यात्माओं की समृद्धि और पापाचारियों की दरिद्रता है। जगन्माता दुर्गा सुकृति मनुष्यों के घर संपत्ति, पापियों के घर में दुर्बुद्धिरूपी अलक्ष्मी, विद्वानों के ह्वदय में बुद्धि और विद्या, सज्जनों में श्रद्धा और भक्ति तथा कुलीन महिलाओं में लज्जा तथा मर्यादा के रूप में निवास करती है। माकंüडेय पुराण कहता है कि "हे देवि! तुम सारे वेद-शास्त्रों का सार हो। संसाररूपी महासागर को पार कराने वाली नौका तुम हो। भगवान विष्णु के ह्वदय में निरंतर निवास करने वाली माता लक्ष्मी तथा शशिशेखर भगवान शंकर की महिमा बढ़ाने वाली माता गौरी भी तुम ही हो।"

नवरात्र के इन पावन नौ दिनों के दौरान कैसे भगवती की आराधना और पूजा-पाठ करें, आइये जाने---

शास्त्रनुसार मां भगवती स्वयं कहती हैं:
शरदकाले माहपूजा क्रियते या च वार्षिकी।

तस्यां ममैतन्माहात्मयं श्रुत्वा भक्ति समन्वित:॥

सर्वबाधाविनिमरूक्तो धनधान्य सुतान्वित:।

मनुष्यो मत्प्रसादने भविष्यति न संशय:॥


अर्थात् शारदीय और वसंत नवरात्रों में जो मेरी महापूजा की जाती है, उसमें श्रद्धाभक्ति के साथ श्री दुर्गा सप्तशती का पाठ करना चाहिए या सुनना 

चाहिए। ऐसा करने पर निसंदेह मानव सभी प्रकार की बाधाओं से मुक्त होकर सुख व समृद्घ जीवन जीने लगता है।
देवी आराधना का आधार-----

शरद और वसंत ऋतु में सभी प्राणी ज्यादा बीमार होते हैं, ऐसे में नियमपूर्वक फलाहार और मन, वचन, कर्म से शुद्ध आचरण करने से स्वस्थ जीवन जीने का अवसर प्राप्त होता है। भारतीय गृहस्थ जीवन के लिए वैसे भी शक्ति पूजन, शक्ति संवर्धन व शक्ति संचय को उपयोगी माना गया है। ‘स्त्रियां समस्ता:, सकला जगत्सु’ के अनुसार विश्व की सभी स्त्रियों को जगदंबा का रूप समझते हुए वीर-वीरांगनाओं के चरित्र से बल और शक्ति प्राप्त करने के उद्देश्य से भी नवरात्रों के दौरान देवी की पूजा की जाती है, जिससे वैवाहिक जीवन के चार शत्रुओं काम, क्रोध, लोभ, मोहादि पर विजय पाई जा सके। पांच महाभूत (आकाश, वायु, अग्नि, जल व पृथ्वी) तथा चार अंत:करण जैसे मन, बुद्घि, चित व अहंकार कुल नौ तत्व ही प्रकृति विकार के मुख्य परिणाम हैं। हर महिला जिसे गृहस्थ जीवन को सुखी बनाना है, उसे इनका महत्व जानना चाहिए।  अनेक स्थानों पर कहा गया है-

दैत्यनाशार्थवचनो दकार: परिकीर्तित:।
उकारो विघ्ननाशस्य वाचको वेदसम्मत:॥
रेफो रोगघ्नवचनो गश्च पापघ्नवाचक:।
भयशत्रुघ्नवचनश्चाकार: परिकीर्तित:॥

अर्थात् द-दैत्यनाश, उ-विघ्ननाश, र-रोगनाश, ग-पापनाश, आ-भय और शत्रुनाश का तात्पर्य है। अत: ‘ओम दुं दुर्गायै नम:’ भी एक प्रभावशाली मन्त्र है। मां से शक्ति प्राप्त कर हमें जिनका नाश करना है वे राक्षस कौन हैं? दुर्ग यानी हमारे तन-मन में छुपे तौर पर रहने वाले शोक, रोग, भव बन्धन, भय, आशंका आदि मनोविकार, शरीर के सामान्य क्रियाकलापों को प्रभावित करने वाले विकार या कीटाणु, जाने अनजाने होने वाले पाप, सब तरह के गुप्त प्रकट शत्रु ही दैत्य हैं।
रोग, शोक, महामारी, भय सामने हो, अपने शरीर की प्रतिरोधक शक्ति कम हो, रोग होने की आशंका हो या रोग आ चुका हो, तो देवी की शरण में जाना चाहिए।
साधकों की भाषा में यही दुर्गा देवी के नौ रूप हैं। यही आद्यशक्ति तीन रूपों में महालक्ष्मी, महासरस्वती एवं महाकाली के रूप में प्रसिद्ध हैं और सत, रज, तम की अधिष्ठात्री यही तीनों हैं। ये तीनों एक नारी के रूप में शक्तियां है। इन्हीं तीनों स्वरूपों, महाशक्तियों की आराधना करने से हमें बल, बुद्धि व सौभाग्य की प्राप्ति होती है। समस्त देवता भी भगवती की आराधना करते हैं। वे आदिशक्ति महालक्ष्मी के रूप में विराजमान होकर हर जगह पूजे जाते हैं। मां रजोगुण रूप में संसार का निर्माण करती हैं, सात्विक रूप में पालन करती हैं और समय की आवश्यकतानुसार तामसी रूप में संहार करती हैं।
भगवती की आराधना एवं उपासना से विशेष रूप से महिलाओं के अस्तित्व में दुर्गा का संचार होता है। इन नौ दिनों में मां से वरदान स्वरूप सहनशीलता, अस्थिर मन को स्थिरता, विवेक, आत्मबल, आत्मशक्ति की प्राप्ति कर सकते हैं। शक्ति साधना के समय मन, कर्म, वचन से श्रद्धापूर्वक मां की आराधना करने से सुख की प्राप्ति होती है। साधना के समय कई ऐसी स्थितियां सहज ही पैदा होती है, जो मन को भटकाती हैं। मां के स्वरूपों के प्रति विश्वास व प्रेम जागृत रहने से वातावरण में भी असुरी शक्तियों का नाश व दिव्य शक्तियों का संचार होने लगता है। नवरात्र के नौ दिन पावन दिन हैं। स्त्रियों को अपने भीतर छिपी शक्तियों को पहचानने के लिए यह उपयुक्त मौका है। महिलाएं तो शक्ति का भंडार हैं। केवल जरूरत है उन्हें अपने भीतर की संचित शक्तियों को पहचानने और उन्हें सही तरीके से संचालित करने की। 
दुर्गासप्तशती के हर अध्याय में मां के विभिन्न स्वरूपों का उल्लेख मिलता है। दुर्गासप्तशती को ध्यानपूर्वक पढ़ने से मां अंबे की महिमा का बखूबी ज्ञान हो जाता है। दुर्गासप्तशती के तेरह अध्याय मां के स्वरूपों के माध्यम से भक्तों की मुश्किलों को दूर करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। जीवन की किसी भी प्रकार की बाधाओं को दूर करने में नवरात्र के नौ दिन बहुत ही पावन माने गए हैं।
नवरात्र में देवी माँ के व्रत रखे जाते हैं । स्थान–स्थान पर देवी माँ की मूर्तियाँ बनाकर उनकी विशेष पूजा की जाती हैं । घरों में भी अनेक स्थानों पर कलश स्थापना कर दुर्गा सप्तशती पाठ आदि होते हैं भगवती के नौ प्रमुख रूप (अवतार) हैं तथा प्रत्येक बार 9-9 दिन ही ये विशिष्ट पूजाएं की जाती हैं। इस काल को नवरात्र कहा जाता है। वर्ष में दो बार भगवती भवानी की विशेष पूजा की जाती है। इनमें एक नवरात्र तो चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से नवमी तक होते हैं और दूसरे श्राद्धपक्ष के दूसरे दिन आश्विन शुक्ल प्रतिपदा से आश्विन शुक्ल नवमी तक।
इस व्रत में नौ दिन तक भगवती दुर्गा का पूजन, दुर्गा सप्तशती का पाठ तथा एक समय भोजन का व्रत धारण किया जाता है। प्रतिपदा के दिन प्रात: स्नानादि करके संकल्प करें तथा स्वयं या पण्डित के द्वारा मिट्टी की वेदी बनाकर जौ बोने चाहिए। उसी पर घट स्थापना करें। फिर घट के ऊपर कुलदेवी की प्रतिमा स्थापित कर उसका पूजन करें तथा 'दुर्गा सप्तशती' का पाठ कराएं। पाठ-पूजन के समय अखण्ड दीप जलता रहना चाहिए। वैष्णव लोग राम की मूर्ति स्थापित कर रामायण का पाठ करते हैं। दुर्गा अष्टमी तथा नवमी को भगवती दुर्गा देवी की पूर्ण आहुति दी जाती है। नैवेद्य, चना, हलवा, खीर आदि से भोग लगाकर कन्या तथा छोटे बच्चों को भोजन कराना चाहिए। नवरात्र ही शक्ति पूजा का समय है, इसलिए नवरात्र में इन शक्तियों की पूजा करनी चाहिए।
शक्ति एक, रूप अनेक---
हमें मानना होगा देवी किसी पत्थर की मूर्ति में नहीं, वह तो केवल नारी में विराजमान है। वह देवी ही हमारेे घर में मां, पत्नी और बेटी के रूप में मौजूद है। हम घर में इन स्वरूपों का आदर करें और उनसे सच्चरित्र तथा शक्ति का आशीर्वाद मांगें। आज से शरत्काल के पवित्र आश्विन मास में शुभ्र चांदनी को फैलाते शुक्ल पक्ष में घर-घर में "दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोùस्तुते" की शास्त्रीय ध्वनि सुनाई देने लगी है। 

ये मंत्र वे हैं, जिन्हें शताब्दियों से हमारी संस्कृति में भगवती से वर प्राप्ति के लिए जपा जाता है। दुर्गा पूजा, शारदीय नवरात्र और महाशक्तिअनुष्ठान-तीन नाम पर त्योहार एक। नवरात्र अर्थात जौ में उग आए नन्हे-नन्हे अंकुरों तथा नौ दिनों तक घर-आंगन में आनंद प्रसाद बांटती कन्यारूपिणी शक्ति का पूजन-अर्चन-वंदन। नवरात्र वर्ष में चार बार आते हैं। दो बार प्रत्यक्ष और दो बार गु# रूप में, लेकिन इनमें प्रत्यक्ष रूप में आने वाले शारदीय नवरात्र सबसे ज्यादा प्रशस्त हैं। दुर्गास#शती में देवी स्वयं कहती हैं कि "शारदीय नवरात्र में जो व्यक्ति श्रद्धा-भक्ति सहित मेरी पूजा करेगा, वह सभी बाधाओं से मुक्तहोकर धन, धान्य और संतान को प्राप्त करेगा।" 

कैसे करें देवी की पूजा...????
नवरात्र के दिनों में श्रद्घापूर्वक मां का दरबार सजाया जाता है। कई घरों में अखंड ज्योति प्रज्वलित की जाती है।  घर परिवार की शुभता के लिए मंगल कलश स्थापित करके एक मिट्टी के बर्तन में जौ बोने का विधान है। इन नौ दिनों में मां दुर्गा का पूजन, पाठ और हवन किया जाता है। सुबह और शाम उनकी आरती उतारी जाती है।  मां को लाल चुनरिया, लाल फूल चढ़ाए जाते हैं। नवरात्र के दौरान सुबह और शाम भक्तिपूर्वक दुर्गा सप्तशती का पाठ करना चाहिए।
व्यस्तता के कारण आप प्रतिदिन एक अध्याय भी पढ़ सकती हैं। यदि व्रत संकल्प लेकर नौ दिनों का व्रत रखा है, तो भोजन में अन्न और नमक न लें। नवरात्र के दौरान सिर्फ फलाहार ही करें। कई लोग नवरात्र के दौरान सिर्फ पानी पीकर और दिन भर में एक जोड़ा लौंग खाकर ही रहते हैं।
नवरात्र का व्रत श्क्ति उपासना के सभी व्रतों में सर्वोच्च और श्रेष्ठ है। यह संपूर्ण मनोकामनाओं को पूरा करने वाला और मानसिक शांति देने वाला व्रत है। नवरात्र के आठवें दिन दुर्गाष्टमी मनाई जाती है। कुछ लोग नवमी के दिन उद्यापन करते हैं। उद्यापन में सही विधि से पूजा करें। हवन आदि करके मां भगवती को सामर्थ्यनुसार लाल चुनरी, श्रृंगार का सामान, माला और फल आदि चढ़ाकर सौभाग्य का वरदान प्राप्त करें। पूरी, हलवा, चने का भोग लगाकर नौ कुंवारी कन्याओं को भोजन करवाएं और उन्हें सामथ्र्यनुसार उपहार भी दें। दक्षिणा देना भी न भूलें।
श्रद्धानुसार एक बालक को भी भोजन कराएं और दक्षिणा-दान दें। अष्टमी व नवमी की संध्या को भक्तिपूर्वक भजन, पूजन, मां भगवती की आरती करना न भूलें।

देवी भागवत का कथन है कि दुख, दरिद्रता, कष्ट का निवारण, विजय, सामने खड़ी मुसीबत, रोग से रक्षा के लिए दुर्गा की विधि विधान से पूजा अर्चना करनी चाहिए।
ऐसे करें देवी मां की पूजा-अर्चना
प्राय: धार्मिक अनुष्ठानों में शुद्धता, दिशा और स्थान का खास ध्यान रखा जाता है। मां दुर्गा की पूजा करते समय उत्तर-पूर्व के स्थान का चुनाव करें। 
हरियाली (जौ) बोने के लिए शुद्ध छनी हुई मिट्टी लें। माटी के साफ बर्तन में या धरती पर बोएं।
मां की प्रतिमा के दाहिनी ओर हरियाली और बांईओर कलश स्थापित करें।
अखण्ड ज्योति के लिए शुद्घ घी का प्रयोग करें।
मां को लाल चंदन, लाल फूल, लाल चुनरी एवं श्रृंगार की वस्तुएं भेंट करें।
सुबह-शाम मां का दुर्गासप्तशती पाठ, दुर्गा स्तोत्र, दुर्गा स्तुति एवं आरती करके आशीर्वाद प्राप्त करें।
व्रत विधान के अनुसार नौ दिन या कुछ लोग प्रथम व अन्तिम दिन फलाहारी व्रत रख सकते हैं।
अष्टमी के दिन नौ कुंवारी कंन्याओं (9 साल तक की उम्र की अति उत्तम मानी गई है) को मीठा भोजन कराके सामर्थ्यनुसार वस्त्र, वस्तुएं, दक्षिणा भेंट करें।
उद्यापन के बाद एक बालक और अपने गुरूजन को भी भोजन कराके वस्त्र, दक्षिणा देकर अपने सुखमय जीवन का आशीर्वाद प्राप्त करें।
नौवें दिन मां सिद्घिदात्री की आरती करें। इनकी पूजा-अर्चना करने से पारिवारिक संपन्नता, उन्नति, पूर्णता और श्रेष्ठता की प्राप्ति होती है।
नवरात्र क्या है....????
पृथ्वी द्वारा सूर्य की परिक्रमा के काल में एक साल की चार संधियाँ हैं। उनमें मार्च व सितंबर माह में पड़ने वाली गोल संधियों में साल के दो मुख्य नवरात्र पड़ते हैं। इस समय रोगाणु आक्रमण की सर्वाधिक संभावना होती है। ऋतु संधियों में अक्सर शारीरिक बीमारियाँ बढ़ती हैं, अत: उस समय स्वस्थ रहने के लिए, शरीर को शुध्द रखने के लिए और तनमन को निर्मल और पूर्णत: स्वस्थ रखने के लिए की जाने वाली प्रक्रिया का नाम 'नवरात्र'
संस्कृति का पर्व....??
नवरात्र जैसा सांस्कृतिक पर्व साधना और संयम के मनोभावों को प्रकट करने का पर्व-काल है। इन्हीं नौ दिनों में भगवान श्रीराम ने अत्याचारी रावण को मारने के लिए किष्किंधा में प्रवर्षण पर्वत पर "शक्ति पूजा" की थी। अधर्म के थपेड़े खा रहे पांडवों को महाभारत के धर्म युद्ध में विजय प्राप्त करने के लिए श्रीकृष्ण ने इन्हीं नौ दिनों में "देवी पूजा" करने का उपदेश दिया था। धर्मिक इतिहास की ओर नजर डालें तो नवरात्र का उल्लेख वैदिक काल से है। इसी कारण घर-घर में दुर्गा-पूजा उत्सव की तरह मनाई जाती है। शास्त्रीय मान्यता के अनुसार स्वच्छ दीवार पर सिंदूर से देवी की मुख-आकृति बना ली जाती है। सर्वशुद्धा माता दुर्गा की जो तस्वीर लय हो जाए, वही चौकी पर स्थापित कर दी जाती है, पर देवी की असली प्रतिमा तो "घट" है। घट पर घी-सिंदूर से कन्या चिह्न और स्वस्तिक बनाकर उसमें देवी का आह्वान किया जाता है। देवी के दाईं ओर नव-यवांकुर (जौ के अंकुर) और सामने हवनकुंड! नौ दिनों तक नित्य देवी का आह्वान फिर स्नान, वस्त्र और गंध आदि से षोडशोपचार पूजन। नैवेद्य में पतासे और नारियल तथा खीर। पूजन तथा हवन के बाद "दुर्गास#शती" का पाठ।
नारी में नवदुर्गा-----
कूर्मपुराण में धरती की स्त्री का पूरा जीवन आकाश में रहने वाली नवदुर्गा की मूर्ति मे स्पष्ट रूप से बताया गया है। जन्म ग्रहण करती हुई कन्या "शैलपुत्री", कौमार्य अवस्था तक "ब्रह्मचारिणी" तथा विवाह से पूर्व तक चंद्रमा के समान निर्मल और पवित्र होने से "चंद्रघंटा" कहलाती है। नए जीव को जन्म देने हेतु गर्भधारण करने से "कूष्मांडा" और संतान को जन्म देने के बाद वही स्त्री "स्कंदमाता" के रूप में होती है। संयम और साधना को धारण करने वाली स्त्री "कात्यायनी" और पतिव्रता होने के कारण अपनी और पति की अकाल मृत्यु को भी जीत लेने से "कालरात्रि" कहलाती है। कालीपुराण के अनुसार सारे संसार का उपकार करने से "महागौरी" तथा धरती को छोड़कर स्वर्ग प्रयाण करने से पहले पूरे परिवार और सारे संसार को सिद्धि तथा सफलता का आशीर्वाद देती नारी "सिद्धिदात्री" के रूप में जानी जाती है।
नौ दिन या रात...????
अमावस्या की रात से अष्टमी तक या पड़वा से नवमी की दोपहर तक व्रत नियम चलने से नौ रात यानी 'नवरात्र' नाम सार्थक है। यहाँ रात गिनते हैं, इसलिए नवरात्र यानि नौ रातों का समूह कहा जाता है।रूपक के द्वारा हमारे शरीर को नौ मुख्य द्वारों वाला कहा गया है। इसके भीतर निवास करने वाली जीवनी शक्ति का नाम ही दुर्गा देवी है। इन मुख्य इन्द्रियों के अनुशासन, स्वच्छ्ता, तारतम्य स्थापित करने के प्रतीक रूप में, शरीर तंत्र को पूरे साल के लिए सुचारू रूप से क्रियाशील रखने के लिए नौ द्वारों की शुध्दि का पर्व नौ दिन मनाया जाता है। इनको व्यक्तिगत रूप से महत्त्व देने के लिए नौ दिन नौ दुर्गाओं के लिए कहे जाते हैं।
शरीर को सुचारू रखने के लिए विरेचन, सफाई या शुध्दि प्रतिदिन तो हम करते ही हैं किन्तु अंग-प्रत्यंगों की पूरी तरह से भीतरी सफाई करने के लिए हर छ: माह के अंतर से सफाई अभियान चलाया जाता है। सात्विक आहार के व्रत का पालन करने से शरीर की शुध्दि, साफ सुथरे शरीर में शुध्द बुद्धि, उत्तम विचारों से ही उत्तम कर्म, कर्मों से सच्चरित्रता और क्रमश: मन शुध्द होता है। स्वच्छ मन मंदिर में ही तो ईश्वर की शक्ति का स्थायी निवास होता है।
इनका नौ जड़ी बूटी या ख़ास व्रत की चीज़ों से भी सम्बंध है, जिन्हें नवरात्र के व्रत में प्रयोग किया जाता है-
कुट्टू (शैलान्न)
दूध-दही
चौलाई (चंद्रघंटा)
पेठा (कूष्माण्डा)
श्यामक चावल (स्कन्दमाता)
हरी तरकारी (कात्यायनी)
काली मिर्च व तुलसी (कालरात्रि)
साबूदाना (महागौरी)
आंवला(सिद्धीदात्री)
क्रमश: ये नौ प्राकृतिक व्रत खाद्य पदार्थ हैं।
अष्टमी या नवमी..????
यह कुल परम्परा के अनुसार तय किया जाता है। भविष्योत्तर पुराण में और देवी भावगत के अनुसार, बेटों वाले परिवार में या पुत्र की चाहना वाले परिवार वालों को नवमी में व्रत खोलना चाहिए। वैसे अष्टमी, नवमी और दशहरे के चार दिन बाद की चौदस, इन तीनों की महत्ता "दुर्गासप्तशती" में कही गई है।
प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रह्माचारिणी। तृतीयं चंद्रघंटेति कूष्माण्डेति चतुर्थकम्।। पंचम स्कन्द मातेति षष्ठं कात्यायनीति च। सप्तमं कालरात्रीति महागौरीति चाष्टमम्।। नवमं सिद्धिदात्री च नवदुर्गा: प्रकीर्तितता:। उक्तान्येतानि नामानि ब्रह्माणैव महात्मना।। देवी मंत्र की  आराधना के स्वर गूंजते रहते  हें ।
 'के हरि वाहन राजत, खड़ग खपर धारी। सुर नर मुनि जन सेवत, तिनके दुखहारी।। कानन कुण्डल शोभित, नासाग्रे मोती। कोटिक चंद्र दिवाकर समराजत ज्योती।।' श्री अम्बे जी की इस आरती से अनुष्ठान व्रत का विधि विधान से समापन व विसर्जन वैदिक व पारंपरिक ढंग से होता हें । 'या देवी सर्व भूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता नमस्तस्यै-नमस्तस्यै-नमस्तस्यै नमो नम:' देवी सूक्त क मंत्र सभी देवी मंदिरों में सुने जा सकते हें । 
कब और कैसे करे नवरात्री उद्यापन..????

----नवरात्र के अंतिम दिन नौ दिन का नवरात्र व्रत धारण करने वाले श्रद्धालुओं को मंत्रोच्चार के साथ विधिवत पूजन-हवन कर उद्यापन करना चाहिए.। घरों में कलश की स्थापना कर विधान के साथ व्रत धर्म का पालन करने वालों को  नौ कुंवारी कन्याओं को भोजन ग्रहण करवाकर  और द्रव्य, वस्त्र प्रदान करने के बाद पारण करना चाहिए । 
-----देवी मंदिरों में भी नवरात्र के दौरान चलते रहे श्रीदुर्गा सप्तशती के पाठ का समापन किया जाता हें । कई स्थानों पर भंडारे का आयोजन भी किया गया। ------इस दिन श्रद्धालुओं भी मंदिर परिसर में मंत्रोच्चार के साथ हवन कर और नौ कुंवारी कन्याओं को भोजन ग्रहण करवाते हें । 
-----नवरात्र व्रत धारण करने वालों के लिए यह विधान है कि नौ देवियों स्वरूप नौ कन्याओं को भोजन ग्रहण कराने और दान-दक्षिणा के बाद ही व्रत पूरा माना जाता है। 
------नौ दिनों तक नवरात्र व्रत धारण करने वाले श्रद्धालुओं ने हवन-पूजन के बाद नौ कन्यायों को भोजन ग्रहण कराया और खुद पारण किया।
-------उद्यापन के बाद एक बालक और अपने गुरूजन को भी भोजन कराके वस्त्र, दक्षिणा देकर अपने सुखमय जीवन का आशीर्वाद प्राप्त करें। 
------व्रतधारियों को  कुंवारी कन्याओं को भोजन करवाकर अपने व्रत का उद्यापन संपन्न करना चाहिए लोग कुंवारी कन्याओं को भोजन और वस्त्र अर्पित करके अपने व्रत का उद्यापन कर सकते हैं।
केसे करें कन्या पूजन..???
----अष्टमी और नवमी दोनों ही दिन कन्या पूजन और लोंगड़ा पूजन किया जा सकता है। अतः श्रद्धापूर्वक कन्या पूजन करना चाहिये।
----सर्वप्रथम माँ जगदम्बा के सभी नौ स्वरूपों का स्मरण करते हुए घर में प्रवेश करते ही कन्याओं के पाँव धोएं।
----इसके बाद उन्हें उचित आसन पर बैठाकर उनके हाथ में मौली बांधे और माथे पर बिंदी लगाएं।
----उनकी थाली में हलवा-पूरी और चने परोसे।
-----अब अपनी पूजा की थाली जिसमें दो पूरी और हलवा-चने रखे हुए हैं, के चारों ओर हलवा और चना भी रखें। बीच में आटे से बने एक दीपक को शुद्ध घी से जलाएं।
----कन्या पूजन के बाद सभी कन्याओं को अपनी थाली में से यही प्रसाद खाने को दें।
----अब कन्याओं को उचित उपहार तथा कुछ राशि भी भेंट में दें।
-----जय माता दी कहकर उनके चरण छुएं और उनके प्रस्थान के बाद स्वयं प्रसाद खाने से पहले पूरे घर में खेत्री के पास रखे कुंभ का जल सारे घर में बरसाएँ।

मंगलवार, दिसंबर 20, 2011

आइये जाने वर्ष 2012 में केसा रहेगा मीन राशी ( दी, टू, थ, झ, ञ, दे, दो, च, ची ) का राशिफल----

आइये जाने वर्ष 2012  में केसा रहेगा  मीन राशी (  दी, टू, थ, झ, ञ, दे, दो, च, ची ) का राशिफल----

2012 का यह राशिफल चन्द्र राशि आधारित है और वैदिक ज्‍योतिष के सिद्धान्‍तों के आधार पर तैयार किया गया है। 


आइये जाने मीन राशी की विशेषताएं---मीन राशि के लोग अधिकतर जिद्दी, अत्यधिक धार्मिक, क्रमठ, उदासीन और रूढ़िवादी होते हैं. मीन राशि वाले शारीरिक रूप से मध्यम आकार के मोटे, साँवले रंग के होते हैं.आम तौर पर, आप सिद्धांतों के अनुयायी रूढ़िवादी हैं, तो आप धार्मिक रिवाजों और प्रथाओं के पालन में अंधविश्वासी, कठोर भी हो सकते हैं. आप महत्वाकांक्षी, बेचैन और इतिहास के शौकीन हैं.आप पैसे खर्च करने में मितव्ययी होते हैं. आप में आत्मविश्वास की कमी भी होती है.


वर्ष 2012 में   मीन  राशि की आर्थिक वित्तीय स्थिति----

जनवरी 2012 to मार्च  2012 --मीन राशि के लोगों का धन भाव का स्वामी मंगल है. इस समय आपको कड़ी मेहनत करनी पड़ सकती है और कठिन परिश्रम के बाद बहुत सा धन कमा लेंगे. आप अवैध कार्यों के द्वारा भी धन अर्जित करेंगे. आप कालाबाजारी,सट्टा या अन्य किसी संदिग्ध कार्य के माध्यम से भी धनार्जन कर सकते हैं. इस अवधि के दौरान दोस्तों और रिश्तेदारों के साथ मतभेद उत्पन्न हो सकते हैं. आप किसी मुसीबत में फंस सकते हैं आपको विश्वासघात करने के कारण सजा भी मिल सकती है.
अप्रेल 2012 to जून 2012 ---इस अवधि के दौरान गुरू आपके धन भाव मेंस्थित है. ज्योतिषियों, कवियों, लेखकों और वैज्ञानिकों के लिए एक अच्छा समय. धनार्जन के अवसरों में वृद्धि होगी. गुरू जिस नक्षत्र में स्थित होगा आय के साधन उसी के अनुसार निर्धारित होंगे . पूर्ण रूप से यह समय आप के लिए एक भाग्यशाली अवधि.
जुलाई   2012 to सितम्बर  2012 -धन संग्रह एवं बचत के लिए समय अनुकूल नहीं है. खर्च अधिक हो सकते हैं आप अपने आराम और सुख में अधिक धन खर्च कर सकते हैं. जो लोग विदेशी व्यापार में कार्यरत हैं या विदेशी स्रोतों के द्वारा कार्य कर रहे हैं उनके लिए समय बेहतर है, धन लाभ के योग बन रहे हैं. आप विदेश में व्यापार के लिए यात्रा पर जा सकते हैं. सट्टा आदि में धन कि हानि हो सकती है.
अक्टूबर  2012 to दिसंबर  2012 ---    धन भाव का स्वामी नवम भाव में स्थित है यह समय आर्थिक रूप से भाग्यशाली रहेगा. आप विभिन्न स्रोतों के माध्यम से पैसा कमा सकते हैं. अटका हुआ धन प्राप्त होगा. पिता से कुछ अचल संपत्ति प्राप्त हो सकती है. आप एक अच्छे उत्तराधिकारी बनेंगे. लघु उद्योगों में शामिल लोगों को इस अवधि में अच्छा पैसा मिलेगा. कुल मिलाकर, आर्थिक रूप से समय अनुकूल है. 
ये करें उपाय :--- यह वर्ष पैसे और वित्त के मामले में मिश्रित परिणाम देगा. आप लाल मूँगा धारण कर सकते हैं.

2012 में  मीन राशी की व्यापारिक एवं व्यावसायिक स्थिति----

जनवरी 2012 to मार्च  2012 --समय अनुकूल है भाग्य आपका साथ देगा. यह अवधि व्यवसाय और कैरियर के लिए बहुत अच्छी है गुरू के शुभ प्रभाव से आपको धन लाभ होगा. े इस तिमाही में धनार्जन के योग प्रबल हैं आपको बहुत सा आर्थिक लाभ हो सकता है. जो लोग पारिवारिक व्यवसाय में लगे हुए हैं वह सफलता को प्राप्त कर सकेंगे. यदि आपका गुरु कमजोर और पीड़ित है तो आपको व्यवसाय में नुकसान हो सकता है. जो लोग खान-पान और रेस्तरां के कारोबार को अपना व्यवसाय बना चाहते हैं उनके लिए समय अच्छा है.
अप्रेल 2012 to जून 2012 ---  डॉक्टर, नर्स, और कान्वेंट धावक के रूप में कैरियर अपनाना उचित है. फिल्म बनाना, स्क्रिप्ट लेखन, कंपोजिंग और नृत्यकला आपके लिए अनुकूल करियर हैं. इस अवधि के दौरान आपका भाई आपके कैरियर को आगे बढ़ाने में सहायक होगा. आप अपने परिवार के व्यापार में शामिल हो सकते हैं. तिमाही का प्रथम भाग, दूसरे भाग की तुलना में अधिक अनुकूल हो जाएगा.
जुलाई   2012 to सितम्बर  2012 --  इस अवधि में जो लोग मुद्रण तथा लेखन के क्षेत्र से जुड़े हुए हैं उनके लिए समय बहुत अच्छा है. आप अपने प्रतिस्पर्धियों के साथ एक अच्छी और सामान्य प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ सकता है. आप अपने कैरियर को इस समय नई ऊँचाइयों पर ले जाएंगे. जो लोग बाजार नितियों से संबंधित व्यवसाय में हैं उनके लिए समय अनुकूल है. यदि आप दूसरों के लिए सेवा कर रहे हैं तो आप पदोन्नति या वेतन वृद्धि प्राप्त करेंगे. कुल मिलाकर, इस तिमाही में सभी मीन राशि वाले भाग्यशाली रहेंगे.
अक्टूबर  2012 to दिसंबर  2012 ---इस तिमाही में आप जिस भी व्यवसायसे जुडे होंगे वह लम्बे समय बना रहेगा. अपनी ताकतको उपयोग करके, अपने कैरियर के लक्ष्यों को प्राप्त करने का समय है. दसवें भाव का स्वामी बली अवस्था में स्थित होकर आपकी क्षमता और ताकत को सही दिशा में लगाने को प्रोत्साहित करेगा. आप अपने काम के स्थान पर आदर और सम्मान प्राप्त कर सकेंगे. डॉक्टरों और वकीलों के लिए समय अनुकूल है. मंगल के बली होने के कारण आप उर्जा से भरे रहेंगे और कुछ नए कदम साहसिक कदम उठाएंगे.आप अपने कैरियर में अच्छा प्रदर्शन करेंगे. विकास क्रमिक गति से चलता रहेगा. कोई भी बाधा से बचाव के लिए गुरुवार को पुखराज धारण कर सकते हैं.

2012 में  मीन राशी का स्वास्थ्य ---
जनवरी 2012 to मार्च  2012 ---  मीन राशि जल राशि है. इसलिए, आप अत्यधिक मात्रा में शराब के सेवन से बचें. आपकी राशि का स्वामी गुरू है इसलिए भोजन का अत्यधिक मात्रा में सेवन करने से बचें यह आपके स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकता है. इस अवधि के दौरान आप त्वचा रोग से प्रभावित हो सकते हैं. इस समय स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं आपकी परेशानी का कारण बन सकती हैं, लेकिन यह सब कुछ जल्द ही ठीक हो जाएगा.
अप्रेल 2012 to जून 2012 ----शरीर की गर्मी के कारण आप फोड़े- फुसिंयों और बवासीर से पीड़ित हो सकते हैं. छठे भाव का स्वामी आपकी राशि में स्थित है, आपको स्वास्थ्य संबंधी समस्या का सामना करना पड़ सकता है. आप अधीर और परेशान रह सकते हैं. गैस्ट्रिक परेशानियों से आपका पेट प्रभावित रहेगा. शरीर की गर्मी को नियंत्रित करने के लिए मसालेदार भोजन से बचें. और अन्य मुख्य बात है की क्रोध करना आपके लिए खतरनाक हो सकता है.
जुलाई   2012 to सितम्बर  2012 --  इस तिमाही में आपका स्वास्थ्य रक्त में अशुद्धियों से प्रभावित हो सकता है. इस कारण आपको बुखार हो सकता है अगर आपको बुखार है तो रक्त का परीक्षण जरूरी है. इसके अलावा, शरीर के गुप्त भागों में गांठ भी हो सकती है. जैसा कि आप जानते हैं रोग के मूल कारण त्रिदोष यानी वात, पित्त, और कफ के असंतुलन है.वात पित्त और कफ का असंतुलन होने के कारण अनेक रोग उत्पन्न हो सकते हैं. गुरू आपकी राशि का स्वामी है इस कारण आप में कफ की अधिकता और वात कम है. अत: रोगों से बचाव के लिए सही समय पर दवा लेते रहें.
अक्टूबर  2012 to दिसंबर  2012 -- सेहत और स्वास्थ्य को लेकर यह समय बहुत अच्छा नहीं है. शुक्र के छठे भाव में स्थित होने के कारण बीमारी हो सकती है. अत्यधिक यौन गतिविधियों में लिप्त होने के कारण आप स्वास्थ्य को नुकसान पहुँचा सकते हैं. आपको टाइफाइड जैसी बीमारी भी हो सकने की संभावना बन रही है अत: अपना पूर्ण ध्यान रखें. यह अंतिम तिमाही के एक मिश्रित अवधि के रूप में देखी जा सकती है. यदि सूर्य जन्म कुंडली में बली अवस्था में है तो आप जल्द ही इन सभी समस्याओं से मुक्त हो जाएंगे.

2012 में  मीन राशी के प्रेम/प्यार और अन्य सम्बन्ध--

जनवरी 2012 to मार्च  2012 --- गुरू आपका स्वामी ग्रह है और जल इसका राशि तत्व है. आप फैसले लेने में दुविधा में ही रहते हैं आप हमेशा दो विचारों के साथ जुडे़ नज़र आते हैं, आप के भीतर आत्म धोखे के चिन्ह नज़र आते हैं. आप अपने उदार व्यवहार और वैभव द्वारा विपरीत सेक्स को जल्द ही अपनी ओर आकर्षित कर सकते हैं. अप इस अवधि में रहस्यमय हो सकते हैं.
अप्रेल 2012 to जून 2012 ----  मीन राशि काल्पनिक, सहज ज्ञान युक्त से युक्त होते हैं और सहज नहीं रह पाते खोज में लगे रहते हैं. यह शांत सुखदायक गहराई पसंद करते हैं और आशा से भरे होते हैं. इन्हें वादा करना पसंद नहीं लेकिन संबंधों को बेहतर तरीके से निभाते हैं. रिश्तों में सफल होते हैं दिल नहीं दुखाते. इस तिमाही के दौरान आप खुश रहेंगे और जीवन के हर पल का आनंद लेंगे.
जुलाई   2012 to सितम्बर  2012 ---- इस अवधि के दौरान, आप प्यार में सफल रहेंगे. आप शांत भाव के साथ घटनाओं का आनंद ले सकेंगे. यदि जन्म कुंडली में शुक्र या गुरू कमजोर स्थिति में हैं तो कुछ परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है. इस समय आप जोश और उत्साह से भरे रहेंगे प्रेम में रोमांटिक और कामुक हो सकते हैं, बस अपनी भावनाओं पर नियंत्रण रखना सीखें. गलत दोस्तों दे दूर रहें वह आपको अवैध कृत्य के लिए गुमराह कर सकते हैं. इस अवधि के दौरान, कुंभ, कन्या या वृश्चिक राशि के लोगों के साथ प्रेम संबंधों को लेकर सतर्क रहने कि आवश्यकता है.
अक्टूबर  2012 to दिसंबर  2012 --- यह समय आपके लिए थोड़ा दुर्भाग्यपूर्ण हो सकता है. अपने साथी से अपने प्रेम के परिणाम का सामना करने का समय है. आप दो नावों पर सवार होना चाहते हैं यह सही नहीं हैं अत: सही निर्णय लेने का प्रयास करें आप ने अतीत मे चीजों को बहुत हल्के ढंग से लिया जिसका भुगतान अब करना पड़ सकता है. वैसे भी, आप विनम्र हैं और इन स्थितियों को संभालने में सक्षम हैं. अपने आचरण में शांति और धैर्य का भाव रखें आपके आक्रामक रुख से संबंधों में तनाव उत्पन्न हो सकता है. तिमाही के अंत तक सब कुछ पहले जैसा हो जाएगा.


2012 में  मीन राशी की पारिवारिक/फेमिली स्थिति---

जनवरी 2012 to मार्च  2012 ---मीन राशि वाले एक अच्छे जीवन साथी बनते हैं. आपके माता पिता के भाव का स्वामी शुक्र है इस कारण आपको माता पिता से पूर्ण समर्थन व प्यार मिलेगा. आप अपने माता पिता से जुड़े होते हैं. इस अवधि के दौरान माता पिता खराब हो सकता है, इस कारण आपको अपने पिता के स्वास्थ्य का ध्यान रखना चाहिए. आपके पिता विदेश भी जा सकते हैं और आपको पिता से कुछ दूर होना पड़ सकता है.
अप्रेल 2012 to जून 2012 ----  इस अवधि में थोड़े बेचैन रह सकते हैं आपके विचारों में भी अंतर रहेगा. लेकिन आप अपने जीवन साथी को अपने प्यार और स्नेह से मना लेंगे. आप अपनी माँ से अत्यधिक प्रभावित रहेंगे. आपके पिता का स्वास्थ्य बेहतर नहीं है और उन्हें आपके भावनात्मक और शारीरिक सहारे की जरूरत है. आपके भाई- बहन आपका सम्मान करते हैं. मंगल के कमजोर होने पर आपका अपने भाई से विवाद हो सकता है.
जुलाई   2012 to सितम्बर  2012 ----   इस तिमाही में आप अपने परिवार के साथ अच्छा समय बिताएंगे. माँ का लगाव आपकी ओर अधिक रहेगा. माता जी की भावनाओं और उनके प्यार को महत्व दें. अपने दुख दर्द को मां के साथ बांटने का प्रयास करें. इस समय आपको अपने चचेरे भाइयों और दोस्तों का साथ मिल सकता है. वे आपके व्यवसाय में मददगार हो सकते हैं. आप बुद्धिमान और विनम्र व्यक्ति हैं अपनी इसी योग्यता द्वारा अपने परिवार में संतुलन बनाए रखें हैं, आपका यह व्यवहार आपको सम्मान प्रदान करेगा.
अक्टूबर  2012 to दिसंबर  2012 --- यह तिमाही आपके लिए ज्यादा अच्छा नहीं है, पति पत्नी के संबंधों में तनाव उत्पन्न हो सकता है इसलिए धैर्य और शांति के साथ काम लें चीजें खुद ब खुद संभल जाएंगी. इस मुश्किल समय में आपके बच्चे आपका साथ देंगे और आपकी मदद कर सकते हैं. जैसा कि आप जानते हैं, समय खराब हो तो सब कुछ गलत हो जाता है. आपके परिवार में माह के अंत तक सुधार हो सकता है और घर कि शांति पुन: लौट सकती है.
वर्ष 2012 में  मीन  राशी का मासिक भविष्य/राशिफल---
जनवरी राशिफल- ---इस साल के शुरूआत में आपको परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है. निवेश से आशा के अनुरूप धन नहीं आने से मानसिक अशांति में इजाफा होगा. जीवनसाथी आपके साथ कटुता से पेश आएगा. आपका क्रोध मामले को और बिगाड़ सकता है. बाहर का खाने से बचें.
फरवरी राशिफल---- प्रेम-प्रसंग शादी तक पहुंचने के संकेत हैं. माता-पिता की बातों को पूरी तवज्‍जो दें वरना वे नाराज भी हो सकते हैं, लेकिन आराम से समझाने पर उनकी नाराजगी दूर हो जाएगी. स्‍वास्‍थ्‍य उत्तम रहेगा. किसी भी नए काम को करने से पहले उसके हर पहलु पर विचार कर लें. प्रेम हवा में है इसका फायदा उठाएं.
मार्च राशिफल- ---बॉस से किसी तरह का विवाद हो सकता है, आपका अडि़यल रवैया हालात बिगाड़ सकता है. नौकरी में परेशानी रहेगी. आर्थिक रूप से परेशान रह सकते हैं. जीवनसाथी का रवैया आपको परेशानी में डाल सकता है.
अप्रैल राशिफल- ---यह महीना आपके लिए मिलाजुला रहेगा. गुस्‍से में आप अपना ही नुकसान कर सकते हैं. दूसरे आपके क्रोध को आप ही के खिलाफ हथियार के तौर पर इस्‍तेमाल करेंगे. किसी भी चीज को पाने के लिए आपकी जल्‍दबाजी नुकसान कर सकती है.
मई राशिफल- ---करियर के लिहाज से यह बेहतरीन समय साबित हो सकता है. आप ऊंचाईयों को छुएंगे. नई जिम्‍मेदारियां मिल सकती हैं. पदोन्‍नति की भी संभावना है. आय के स्रोत बढ़ेंगे. धन प्राप्ति के योग हैं. सामाजिक कार्यों में आप सदैव तत्‍पर रहेंगे.
जून राशिफल  ---धन जरा संभाल कर खर्च करें. आपकी लापरवाही आपकी भारी क्षति कर सकती है. कहीं बाहर घूमने का कार्यक्रम बन सकता है. यह ब्रेक आपके लिए जरूरी भी है, क्‍योंकि इससे आप तरोताजा होकर अपने भविष्‍य के लिए तैयारियां कर पाएंगे.
जुलाई राशिफल- ---स्‍वास्‍थ्‍य की नजरअंदाजी करने से आपके कार्य प्रभावित होंगे. भाग्‍य आपके साथ रहेगा. इस दौरान आपके कई रुके हुए काम बन जाएंगे. परिवार की ओर से शुभ समाचार मिलेंगे. रचनात्‍मक एवं धार्मिक कार्यों में रुचि बढ़ेगी. निवेश के लिए समय अच्‍छा है. दें
अगस्त राशिफल---- कार्य प्रगति पर रहेंगे. हालांकि महीने के दूसरे पखवाड़े में कुछ परेशानियां आ सकती हैं. जीवनसाथी के साथ तनाव हो सकता है. लेकिन अपने संयमपूर्ण रवैये से आप बात को संभाल पाएंगे. बच्‍चों की ओर से कुछ परेशानियों का सामना कर पड़ सकता है.
सितम्बर राशिफल---- आपके रहन-सहन में बदलाव साफतौर पर नजर आएगा. आपकी जीवनशैली में सकारात्‍मक बदलाव सबको हैरानी में डाल देगा. कामकाज के स्‍थान पर आपको नयी जिम्‍मेदारी मिल सकती है. हालांकि कोई आपकी इस तरक्‍की से जल भी सकता है और इस दौरान आपका उससे झगड़ा भी हो सकता है.हालांकि अच्‍छे परिणामों की गति बनाए रखने के लिए आपको कड़ी मेहनत करनी होगी.
अक्टूबर राशिफल- आपके दुश्‍मन आपके काम बिगाड़ने की कोशिश करेंगे. व्‍यापार से जुड़े लोगों को नुकसान उठाना पड़ सकता है. हालांकि इन सबके बावजूद आपको वरिष्‍ठ जनों एवं परिवार के बड़ों का भरपूर सहयोग प्राप्‍त होगा. अनायास खर्चे भी बढ़ सकते हैं.
नवम्बर राशिफल---- आपके जीवन में अनायास ही बदलाव आएंगे. महीने के मध्‍य तक आपका भाग्‍य पूरी तरह आपके साथ रहेगा. इस दौरान किस्‍मत आपका दरवाजा खटखटाएगी, लेकिन मौकों का फायदा उठाना आप पर निर्भर करता है. जीवनसाथी का बर्ताव भी आपके लिए सुखद होगा.
दिसम्बर राशिफल--- आय के स्रोत बढ़ेंगे सकते हैं. प्रतियोगी परीक्षाओं में कामयाबी मिलेगी. इस दौरान आप लंबी छलांग लगा सकते हैं, बशर्ते इसके लिए आप पुरुषार्थ करने को तैयार हों. सकारात्‍मक ऊर्जा का प्रवाह निरंतर बना रहेगा. मित्रों का सहयोग प्राप्‍त होगा.

शुक्रवार, दिसंबर 02, 2011

इन बातों का रखें ध्यान/ख्याल बोलते समय /बातचीत के दोरान (इन सोलह बातों का खास ध्यान रखना चाहिए)-

इन बातों का रखें ध्यान/ख्याल बोलते समय /बातचीत के दोरान (इन सोलह बातों का खास ध्यान रखना चाहिए)-

1. बहुत ज्यादा नहीं बोलना चाहिए।

2. बिल्कुल चुप भी नहीं रहना चाहिए।

3. समय-समय पर बोलना चाहिए।

4. दो लोग यदि बात कर रहे हैं तो उनके बीच में बिना पूछे नहीं बोलना चाहिए।

5. बिना सोचे-विचारे कोई बात नहीं करना चाहिए।

6. बोलने में शीघ्रता नहीं करनी चाहिए।

7. ऊट-पटांग बात नहीं करना चाहिए।

8. उलाहना भरी और मतभेदी बात नहीं करना चाहिए।

9. हमेशा धर्म युक्त और यथार्थ बात करनी चाहिए।

10. दूसरे लोगों को जो बातें बुरी लगती हैं वे बात कभी नहीं बोलना चाहिए।

11. किसी को भी ताना नहीं मारना चाहिए, ना ही व्यंग्य करना चाहिए।

12. अनावश्यक हंसी और दिल्लगी नहीं करना चाहिए।

13. दूसरों की बुराई नहीं करना चाहिए।

14. सच, कोमल, मधुर वाणी रखना चाहिए।

15. अपने मुख से ही स्वयं की प्रशंसा नहीं करना चाहिए।

16. बात करते समय किसी भी प्रकार की जिद नहीं करना चाहिए।

मंगलवार, नवंबर 22, 2011

कैसे करे .. शनि देव/ग्रह को पूजा/आराधना से प्रसन्न ????

कैसे करे .. शनि देव/गृह को पूजा/आराधना से..????

जिनकी कुंडली में शनि आशुभ है या जन्मकुंडली में शनि ग्रह अशुभ प्रभाव में होने पर व्यक्ति को निर्धन हो जाये , हर समय आलसी रहे , दुःखी, कम शक्तिवान, बार बार व्यापार में हानि उठाने वाला, जब शनि अशुभ फल देता है तो जातक नशीले पदार्थों का सेवन करने वाला बन जाता है , उसका दिमाक अच्छे कार्यों को नहीं करता जिसके कारन उसे जुआ खेलने , मैच में सट्टा लगाने या खिलाने वाला बन जाता है ,ऐसे जातक को कब्ज का रोगी, जोड़ों में दर्द से पीड़ित, वहमी , नास्तिक या बुरे कर्मो को करने वाला , बेईमान- धोखेबाज तिरस्कृत और अधर्मी बनता है , ऐसे जातक निम्न उपाय करे ..
शनि ग्रह का उपाय …
एक समय में केवल एक ही उपाय करें.उपाय कम से कम 40 दिन और अधिक से अधिक 43 दिनो तक करें.यदि किसी करणवश नागा हो तो फिर से प्रारम्भ करें., यदि कोइ उपाय नहीं कर सकता तो खून का रिश्तेदार ( भाई, पिता, पुत्र इत्यादि) भी कर सकता है.–
१- ऐसे जातक को मांस , मदिरा, बीडी- सिगरेट नशीला पदार्थ आदि का सेवन न करे ,
२-हनुमान जी की पूजा करे , बंरंग बाण का पाठ करे ,
३- पीपल को जल दे अगर ज्यादा ही शनि परेशां करे तो शनिवार के दिन शमसान घाट या नदी के किनारे पीपल का पेड़ लगाये ,
४-सवा किलो सरसों का तेल किसी मिट्टी के कुल्डह में भरकर काला कपडा बांधकर किसी को दान दे दें या नदी के किनारे भूमि में दबाये .
५-शनि के मंत्र का प्रतिदिन १०८ बार पाठ करें। मंत्र है ॐ प्रां प्रीं प्रौं सः शनैश्चराय नमः। या शनिवार को शनि मन्त्र ॐ शनैश्वराय नम का २३,००० जाप करे .
६- उडद के आटे के 108 गोली बनाकर मछलियों को खिलाने से लाभ होगा ,
७-बरगद के पेड की जड में गाय का कच्चा दूध चढाकर उस मिट्टी से तिलक करे तो शनि अपना अशुभ प्रभाव नहीं देगा ,
८- श्रद्धा भाव से काले घोडे की नाल या नाव की कील का छल्ला मध्यमा अंगुली में धारण करें या शनिवार सरसों के तेल की मालिश करें,
९- शनिवार को शनि ग्रह की वस्तुओं का दान करें, शनि ग्रह की वस्तुएं हैं –काला उड़द,चमड़े का जूता, नमक, सरसों तेल, तेल, नीलम, काले तिल, लोहे से बनी वस्तुएं, काला कपड़ा आदि।
१०-शनिवार के दिन पीपल वृक्ष की जड़ पर तिल या सरसों के तेल का दीपक जलाएँ।
११- गरीबों, वृद्धों एवं नौकरों के प्रति अपमान जनक व्यवहार नहीं करना चहिए.
१२-शनिवार को साबुत उडद किसी भिखारी को दान करें.या पक्षियों को ( कौए ) खाने के लिए डाले ,
१३-ताऊ एवं चाचा से झगड़ा करने एवं किसी भी मेहनतम करने वाले व्यक्ति को कष्ट देने, अपशब्द कहने से कुछ लोग मकान एवं दुकान किराये से लेने के बाद खाली नहीं करते अथवा उसके बदले पैसा माँगते हैं तो शनि अशुभ फल देने लगता है।
१४- बहते पानी में रोजाना नारियल बहाएँ। या किसी बर्तन में तेल लेकर उसमे अपना क्षाया देखें और बर्तन तेल के साथ दान करे. क्योंकि शनि देव तेल के दान से अधिक प्रसन्ना होते है,
अपना कर्म ठीक रखे तभी भाग्य आप का साथ देगा और कर्म कैसे ठीक होगा इसके लिए आप मन्दिर में प्रतिदिन दर्शन के लिए जाएं.,माता-पिता और गुरु जानो का सम्मान करे ,अपने धर्मं का पालन करे,भाई बन्धुओं से अच्छे सम्बन्ध बनाकर रखें.,पितरो का श्राद्ध करें. या प्रत्येक अमावस को पितरो के निमित्त मंदिर में दान करे,गाय और कुत्ता पालें, यदि किसी कारणवश कुत्ता मर जाए तो दोबारा कुत्ता पालें. अगर घर में ना पाल सके तो बाहर ही उसकी सेवा करे,यदि सन्तान बाधा हो तो कुत्तों को रोटी खिलाने से घर में बड़ो के आशीर्वाद लेने से और उनकी सेवा करने से सन्तान सुख की प्राप्ति होगी .गौ ग्रास. रोज भोजन करते समय परोसी गयी थाली में से एक हिस्सा गाय को, एक हिस्सा कुत्ते को एवं एक हिस्सा कौए को खिलाएं आप के घर में हमेसा बरक्कत रहेगी..

मंगलवार, नवंबर 15, 2011

जन्म कुंडली के चौथे व पाँचवें भाव से जानें विषय--- (ज्योतिष अनुसार शिक्षा के योग))-----

जन्म कुंडली के चौथे व पाँचवें भाव से जानें विषय---

(ज्योतिष अनुसार शिक्षा के योग))-----

दसवीं की परीक्षा उत्तीर्ण करते ही 'कौन-सा विषय चुनें' यह यक्ष प्रश्न बच्चों के सामने आ खड़ा होता है। माता-पिता को अपनी महत्वाकांक्षाओं को परे रखकर एक नजर कुंडली पर भी मार लेनी चाहिए। बच्चे किस विषय में सिद्धहस्त होंगे, यह ग्रह स्थिति स्पष्ट बताती है।
आज जीवन के हर मोड़ पर आम आदमी स्वयं को खोया हुआ महसूस करता है। विशेष रूप से वह विद्यार्थी जिसने हाल ही में दसवीं या बारहवीं की परीक्षा उत्तीर्ण की है, उसके सामने सबसे बड़ा संकट यह रहता है कि वह कौन से विषय का चयन करे जो उसके लिए लाभदायक हो। एक अनुभवी ज्योतिषी आपकी अच्छी मदद कर सकता है। जन्मपत्रिका में पंचम भाव से शिक्षा तथा नवम भाव से उच्च शिक्षा तथा भाग्य के बारे में विचार किया जाता है। सबसे पहले जातक की कुंडली में पंचम भाव तथा उसका स्वामी कौन है तथा पंचम भाव पर किन-किन ग्रहों की दृष्टि है, ये ग्रह शुभ-अशुभ है अथवा मित्र-शत्रु, अधिमित्र हैं विचार करना चाहिए। दूसरी बात नवम भाव एवं उसका स्वामी, नवम भाव स्थित ग्रह, नवम भाव पर ग्रह दृष्टि आदि शुभाशुभ का जानना। तीसरी बात जातक का सुदर्शन चंद्र स्थित श्रेष्ठ लग्न के दशम भाव का स्वामी नवांश कुंडली में किस राशि में किन परिस्थितियों में स्थित है ज्ञात करना, तीसरी स्थिति से जातक की आय एवं आय के स्त्रोत का ज्ञान होगा। जन्मकुंडली में जो सर्वाधिक प्रभावी ग्रह होता है सामान्यत: व्यक्ति उसी ग्रह से संबंधित कार्य-व्यवसाय करता है। यदि हमें कार्य व्यवसाय के बारे में जानकारी मिल जाती है तो शिक्षा भी उसी से संबंधित होगी। जैसे यदि जन्म कुंडली में गुरु सर्वाधिक प्रभावी है तो जातक को चिकित्सा, लेखन, शिक्षा, खाद्य पदार्थ के द्वारा आय होगी। यदि जातक को चिकित्सक योग है तो जातक जीव विज्ञान विषय लेकर चिकित्सक बनेगा। यदि पत्रिका में गुरु कमजोर है तो जातक आयुर्वेदिक, होम्योपैथिक, रैकी या इनके समकक्ष ज्ञान प्राप्त करेगा। श्रेष्ठ गुरु होने पर एमबीबीएस की पढ़ाई करेगा। यदि गुरु के साथ मंगल का श्रेष्ठ योग बन रहा है तो शल्य चिकित्सक, यदि सूर्य से योग बन रहा है तो नेत्र चिकित्सा या सोनोग्राफी या इलेक्ट्रॉनिक उपकरण से संबंधित विषय की शिक्षा, यदि शुक्र है तो महिला रोग विशेषज्ञ, बुध है तो मनोरोग तथा राहु है तो हड्डी रोग विशेषज्ञ बनेगा। चंद्र की श्रेष्ठ स्थिति में किसी विषय पर गहन अध्ययन करेगा। लेखक, कवि, श्रेष्ठ विचारक बनेगा तथा बीए, एमए कर श्रेष्ठ चिंतनशील, योजनाकार होगा। सूर्य के प्रबल होने पर इलेक्ट्रॉनिक से संबंधित शिक्षा ग्रहण करेगा। यदि मंगल अनुकूल है तो ऐसा जातक कला, भूमि, भवन, निर्माण, खदान, केमिकल आदि से संबंधित विषय शिक्षा ग्रहण करेगा। बुध प्रधान कुंडली वाले जातक बैंक, बीमा, कमीशन, वित्तीय संस्थान, वाणी से संबंधित कार्य, ज्योतिष-वैद्य, शिक्षक, वकील, सलाहकार, चार्टड अकाउंटेंट, इंजीनियर, लेखपाल आदि का कार्य करते हैं। अत: ऐसे जातक को साइंस, मैथ्स की शिक्षा ग्रहण करना चाहिए किंतु यदि बुध कमजोर हो तो वाणिज्य विषय लेना चाहिए। बुध की श्रेष्ठ स्थिति में चार्टड अकाउंटेंट की शिक्षा ग्रहण करना चाहिए। शुक्र की अनुकूलता से जातक साइंस की शिक्षा ग्रहण करेगा। शुक्र की अधिक अनुकूलता होने से जातक फैशन, सुगंधित व्यवसाय, श्रेष्ठ कलाकार तथा रत्नों से संबंधित विषय को चुनता है। शनि ग्रह प्रबंध, लौह तत्व, तेल, मशीनरी आदि विषय का कारक है। अत: ऐसे जातकों की शिक्षा में व्यवधान के साथ पूर्ण होती है। शनि के साथ बुध होने पर जातक एमबीए फाइनेंस में करेगा। यदि शनि के साथ मंगल भी कारक है तो सेना-पुलिस अथवा शौर्य से संबंधित विभाग में अधिकारी बनेगा। राहु की प्रधानता कुटिल ज्ञान को दर्शाती है। केतु - तेजी मंदी तथा अचानक आय देने वाले कार्य शेयर, तेजी मंदी के बाजार, सट्टा, प्रतियोगी क्वीज, लॉटरी आदि। कभी-कभी एक ही ग्रह विभिन्न विषयों के सूचक होते हैं तो ऐसी स्थिति में जातक एवं ज्योतिषी दोनों ही अनिर्णय की स्थिति में आ जाते हैं। उसका सही अनुमान लगाना ज्योतिषी का कार्य है। ऐसी स्थिति में देश, काल एवं पात्र को देखकर निर्णय लेना उचित रहेगा। जैसे नवांश में बुध का स्वराशि होना ज्योतिष, वैद्य, वकील, सलाहकार का सूचक है। अब यहां जातक के पिता का व्यवसाय (स्वयं की रुचि) जिस विषय की होगी, वह उसी विषय का अध्ययन कर धनार्जन करेगा। 
सामान्यत: वैदिक ग्रंथों के अनुसार सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, गुरू और शनि इन सात ग्रहों का अपना अलग-अलग क्षेत्र और प्रभाव है। लेकिन, जब इन ग्रहों का आपसी योग बनता है तो क्षेत्र और प्रभाव बदल जाते हैं। इन ग्रहों के साथ राहु और केतु मिल जाये, तो कार्य में बाधा उत्पन्न करते हैं। व्यवहारिक भाशा में कहें तो टांग अड़ाते हैं। जन्मकुंडली के मुख्य कारक ग्रह ही कुंडली के प्रेसिडेंट होते हैं। यानी जो भी कुछ होगा वह उन ग्रहों की देखरेख में होगा, अत: यह ध्यान में जरूर रखें कि इस कुंडली में कारक ग्रह कौन से हैं। अगर कारक ग्रह कमजोर हैं या अस्त है, वृद्धावस्था में हैं तो उसके बाद वाले ग्रहों का असर आरंभ हो जायेगा। मंगल, शुक्र और सूर्य, शनि करियर की दशा तय करते हैं। बुध और गुरु उस क्षेत्र की बुद्धि और शिक्षा प्रदान करते हैं। यद्यपि क्षेत्र इनका भी निश्चित है, लेकिन इन पर जिम्मेदारियां ज्यादा रहती हैं। इसलिये कुंडली में इनकी शक्ति महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। आज हम किसी एक या दो ग्रहों के करियर पर प्रभाव की चर्चा करेंगे। जन्मकुंडली में वैसे तो सभी बारह भाव एक दूसरे को पूरक हैं, किंतु पराक्रम, ज्ञान, कर्म और लाभ इनमें महत्?वपूर्ण है। इसके साथ ही इन सभी भावों का प्रभाव नवम भाग्य भाव से तय होता है। अत: यह परम भाव है।

सूर्य और मंगल यानी सोच और साहस के परम शुभ ग्रह माने गये हैं। सूर्य को कुंडली की आत्मा कहा गया है। और शोधपरक, आविष्कारक, रचनात्मक क्षेत्र से संबंधित कार्यों में इनका खास दखल रहता है। मशीनरी अथवा वैज्ञानिक कार्यों की सफलता सूर्यदेव के बगैर संभव ही नहीं है। जब यही  सूक्ष्म कार्य मानव शरीर से जुड़ जाता है तो शुक्र का रोल आरंभ हो जाता है, क्योंकि मेंडिकल एस्ट्रोजॉली में शुक्र तंत्रिका तंत्र विज्ञान के कारक हैं। यानी शुक्र को न्यूरोलॉजी और गुप्त रोग का ज्ञान देने वाला माना गया है। सजीव में शुक्र का रोल अधिक रहता है और निर्जीव में सूर्य का रोल अधिक रहता है। यदि आपकी कुंडली में ये दोनों ग्रह एक साथ हैं और दक्ष अंश की दूरी पर हैं तो ह मानकर चलें कि इनका फल आपके ऊपर अधिक घटित होगा। तीसरे भाव, पांचवें भाव, दशम भाव और एकादश भाव में इनकी स्थिति आपके कुशल वैज्ञानिक, आविश्कारक, डॉक्टर, संगीतज्ञ, फैशन डिजाइनर, हार्ट अथवा न्यूरो सर्जन बना सकती है। इन दोनों की युति में शुक्र बलवान हों, तो स्त्री रोग विशेषज्ञ बना सकते हैं। साथ ही ललित कला और फिल्म उद्योग में संगीतकार आदि बन सकते हैं। लेकिन, जब इन्हीं सूर्य के साथ मंगल मिले हैं, तो पुलिस, सेना, इंजीनियर, अग्निशमन विभाग, कृषि कार्य, जमीन-जायदाद, ठेकेदारी, सर्जरी,  खेल, राजनीति तथा अन्य प्रबंधन कार्य के क्षेत्र में अपना भाग्य आजमा सकते हैं। यदि इनकी युति पराक्रम भाव में दशम अथवा एकादश भाव में हो इंजीनियरिंग, आईआईटी वैज्ञानिक बनने के साथ-साथ अच्छे खिलाड़ी और प्रशासक बनना लगभग सुनिश्चित कर देती है। अधिकतर वैज्ञानिक, खिलाडिय़ों और प्रभावशाली व्यक्तियों की कुंडली में यह युति और योग देखे जा सकते हैं। आज के प्रोफेशनल युग में इनका प्रभाव और फल चरम पर रहता है। इसलिये यह मानकर चलें कि यदि कुंडली में मंगल, सूर्य तीसरे दसवे या ग्याहरवें भाव में हो तो अन्य ग्रहों के द्वारा बने हयु योगों को ध्यान में रखकर उपरोक्त कहे गये क्षेत्रों में अपना भाग्य आजमाना चाहिये। यदि इनके साथ बुध भी जुड़ जायें तो एजुकेशन, बैंक और बीमा क्षेत्र में किस्मत आजमा सकते हैं। लेकिन, इसके लिये कुंडली में बुध ओर गुरु की स्थिति पर ध्यान देने की जरूरत है। वास्तुकला तथा अन्य नक्काशी वाले क्षेत्रों के दरवाजे भी आपके लिये खुल जायेंगे, इसलिये कुंडली में अगर सूर्य, मंगल की प्रधानता हो तो इनके कारक अथवा संबंधित क्षेत्र अति लाभदायक और कामयाबी दिलाने वाले रहेंगे, इसलिये जो बेहतर और आपकी प्रकृति को सूट करे वही क्षेत्र चुनें।

* विषय के चुनाव हेतु कुंडली के चौथे व पाँचवें भाव का प्रमुख रूप से अध्ययन करना चाहिए। साथ ही लग्न यानी व्यक्ति के स्वभाव का ‍भी विवेचन कर लेना चाहिए।

ग्रहानुसार विषय :-----
* यदि चौथे व पाँचवें भाव पर हो।

1सूर्य का प्रभाव - आर्ट्‍स, विज्ञान

2 मंगल का प्रभाव - जीव विज्ञान

3. चंद्रमा का प्रभाव - ट्रेवलिंग, टूरिज्म,

4. बृहस्पति का प्रभाव - किसी विषय में अध्यापन की डिग्री

5 बुध का प्रभाव - कॉमर्स, कम्प्यूटर

6 शुक्र का प्रभाव- मीडिया, मास कम्युनिकेशन, गायन, वादन

7 शनि का प्रभाव- तकनीकी क्षेत्र, गणित

इन मुख्‍य ग्रहों के अलावा ग्रहों की युति-प्रतियुति का भी अध्ययन करें, तभी किसी निष्कर्ष पर पहुँचें। (जैसे शुक्र और बुध हो तो होम्योपैथी या आयुर्वेद पढ़ाएँ) ताकि चुना गया विषय बच्चे को आगे सफलता दिला सके।

कैसी होगी शिक्षा..??? किस दिशा में और किस  क्षेत्र में होगी शिक्षा ..???

वर्तमान में प्रत्येक व्यक्ति उच्च शिक्षा पाना चाहता है अथवा अपनी सन्तान को उच्च शिक्षा दिलाना चाहता है जिससे वह भविष्य में अच्छी नौकरी या व्यापार करके सुख व समस्या रहित जीवन जी सके। दूसरे शब्दों में यह कह लीजिए कि प्रत्येक व्यक्ति सन्तान को उच्च शिक्षा  दिलाकर उसका अच्छा कैरियर बनाना चाहता है। उच्च शिक्षा प्राप्ति के लिए कुण्डली का चतुर्थ, पंचम एवं द्वितीय भाव में स्थित ग्रह व उनके स्वामियों की स्थिति, पंचमेश, चतुर्थेश, द्वितीयेश के साथ शुभ व अशुभ ग्रहों की स्थिति, दृष्टि व युति, दशमेश व दशम भाव की स्थिति के साथ-साथ चतुर्विशांश कुंडली, दशमांश कुंडली तथा कारंकाश कुंडली का अध्ययन शिक्षा, वाणी, बुद्धि तथा तर्कशक्ति आदि के बारे में बताता है।

 शिक्षा कैसी होगी, जातक भविष्य में किस दिशा में, क्षेत्र में, अपनी आजीविका प्राप्त करेगा व उसके सुखद भविष्य के लिए कौन-कौन क्षेत्र अच्छे रहेंगे, इन प्रश्नों के उत्तर एक ज्योतिषी जन्मकुंडली का विश्लेषण करके बता सकता है।
 कुण्डली के चतुर्थ भाव से विद्या, पंचम भाव से बुद्धि, द्वितीय भाव से वाणी, आठवें भाव से सामान्य ज्ञान एवं गुप्त विद्या तथा दशम भाव से विद्या जनित यश व आजीविका का भान होता है। इन सभी भावों में स्थित ग्रह, इनके स्वामी ग्रह आदि के विश्लेषण से जातक की शिक्षा व विद्या का क्षेत्र कैसा रहेगा तथा भविष्य कैसा होगा यह जाना जाता है।
शिक्षा प्राप्ति के कुछ अनुभूत ज्योतिष योगों की चर्चा करते हैं-
   1-यदि गुरु केंद्र(1,4,7व 10) में हो तो जातक बुद्धिमान होता है। गुरु उच्च अथवा स्वग्रही हो तो और अच्छा फल देता है।
 2-पंचम भाव में सूर्य सिंह राशि में हो तो जातक मनोनुकूल शिक्षा पूर्ण करता है।
    3-बुध पंचम में हो तथा पंचमेश बली होकर केंद्र में स्थित हो तथा शुभ ग्रहों से दृष्ट हो तो जातक बुद्धिमान होता है।
4-पंचमेश उच्च का केंद्र या त्रिकोण में स्थित हो तो जातक पूर्ण शिक्षा पाता है।
5-गुरु शुक्र व बुध यदि केंद्र व त्रिकोण में एक साथ या अलग-अलग स्थित हों तथा गुरु उच्च, स्वग्रही या मित्र क्षेत्र में हो तो सरस्वती योग बनता है। ऐसे जातक पर सरस्वती की विशेष कृपा होती है।
6-दशमेश व पंचमेश का स्थान परिवर्तन अर्थात् दशम भाव का स्वामी पंचम में तथा पंचम भाव का स्वामी दशम में हो तो व्यक्ति अच्छी शिक्षा प्राप्त करता है।
7-बुध, चंद्रमा व मंगल पर शुक्र या गुरु की दृष्टि हो तो भी जातक बड़ा बुद्धिमान होता है।
  8-पंचम भाव में गुरु हो तो जातक अनेक शास्त्रों का ज्ञाता पुत्र व मित्रों से समृद्ध, बुद्धिमान व धैर्यवान होता है।
  9-लग्नेश यदि 12वें या 8वें भाव में हो तो जातक सिद्धि प्राप्त करता है और वह विद्या विशारद होता है।
10-चतुर्थेश सप्तम व लग्न में हो तो जातक बहुत सी विद्या का ज्ञाता होता है।
11-चंद्रमा से गुरु त्रिकोण में हो, बुध से मंगल त्रिकोण में और गुरु से बुध एकादश स्थान में हो तो जातक अच्छी शिक्षा प्राप्त  करके बहुत सा धन अर्जन करता है।
12-शिक्षा प्राइज़ में सूर्य चंद्र, बुध, गुरु, मंगल व शनि ग्रह की विशेष भूमिका है। इसके अतिरिक्त लग्नेश, पंचमेश व नवमेश तथा इन भावों का विश्लेषण भी उच्च शिक्षा प्राप्ति हेतु करना चाहिए। लग्नेश निर्बल हुआ तो बुद्धि व भाग्य व्यर्थ हो जाएंगे, यदि पंचम भाव निर्बल हुआ तो शरीर और भाग्य क्या करेंगे और यदि भाग्य कमजोर हुआ तो शरीर व बुद्धि व्यर्थ होंगे।
13-पंचमेश शुभ ग्रह हो और पंचमेश का नवांशपति भी शत्रु ग्रहों से युत व दृष्टा न हो तो उच्च शिक्षा प्राप्त होती है।
 14-गुरु केंद्र या त्रिकोण में होकर शनि, राहु, केतु से युत या दृष्ट हो तो जातक उच्च शिक्षा प्राप्त कर विद्वान बनता है।
15-गुरु द्वितीयेश होकर बलवान सूर्य व शुक्र से दृष्ट हो तो जातक व्याकरण शास्त्र का ज्ञाता होता है।
16-पंचम भाव व पंचमेश बुध व मंगल के प्रभाव में हो तो जातक व्?यापार संबंधी उच्?च शिक्षा प्राप्त करता है।
17-धन भाव में मंगल शुभ ग्रहों से दृष्ट हो या धनभाव में चंद्र, मंगल की युति हो व बुध द्वारा दृष्ट हो तो जातक गणित विषय का ज्ञाता होता है।
18-यदि द्वितीयेश से 8वें, 12वें शुभ ग्रह हों तो जातक प्रखर विद्वान होता है।
 19-लग्नेश, पंचमेश, नवमेश में परस्?पर युति या दृष्टि संबंध हो तो जातक उच्च शिक्षा प्राप्त करता है।
 20-गुरु व चंद्रमा एक-दूसरे के घर में हो तो चंद्रमा पर गुरु की दृष्टि हो तो सरस्वती योग होता है, जिससे जातक साहित्य, कला व काव्य में उच्च शिक्षा पाकर लोकप्रिय होता है।
21- गुरु लग्न में हो तथा चंद्र से तृतीय सूर्य, मंगल, बुध हो तो जातक विज्ञान विषय में उच्च शिक्षा पाकर वैज्ञानिक बनता है।
 22-यदि मेष लग्न हो और पंचम में बुध तथा सूर्य पर गुरु की दृष्टि पड़े तो जातक उच्च शिक्षा पाता है।
 23-यदि वृष लग्न हो और उसमें सूर्य बुध की युति लग्न, चतुर्थ या अष्टम में हो तो जातक उच्च शिक्षा पाता है।   
 24-यदि मिथुन लग्न हो और लग्न में शनि, तृतीय में शुक्र तथा नवम में गुरु स्थित हो तो जातक उच्च शिक्षा पाता है।
25-यदि कर्क लग्न हो और उसमें लग्न में बुध, गुरु व शुक्र की युति हो तो जातक उच्च शिक्षा पाता है।
26-यदि सिंह लग्न हो और मंगल-गुरु की युति चतुर्थ, पंचम या एकादश भाव में हो तो जातक उच्च शिक्षा पाता है।
  27-यदि कन्या लग्न हो और उसमें एकादश भाव में गुरु, चंद्र तथा नवम भाव में बुध स्थित हो तो जातक उच्च शिक्षा पाता है। 
28-यदि तुला लग्न हो और अष्टम में शनि गुरु द्वारा दृष्ट हो तथा नवम में बुध स्थित हो तो जातक उच्च शिक्षा पाता है।
 29-यदि वृश्चिक लग्न हो और उसमें बुध सूर्य हो तथा नवम भाव में गुरु चंद्र स्थित हो तो जातक उच्च शिक्षा पाता है।
30- यदि धनु लग्न हो और उसमें गुरु हो तथा पंचम में मंगल व चंद्र स्थित हो तो जातक उच्च शिक्षा पाता है।
 31- यदि मकर लग्न हो और उसमें शुक्र-मंगल की युति हो तथा पंचम भाव में चंद्र गुरु द्वारा दृष्ट हो तो जातक उच्च शिक्षा पाता है।
32- यदि कुंभ लग्न और एकादश भाव में चंद्र तथा षष्ठ भाव में गुरु स्थित हो तो जातक उच्च शिक्षा पाता है।
33- यदि मीन लग्न हो और उसमें गुरु षष्ठ, शुक्र अष्ठम, शनि नवम तथा मंगल-चंद्र एकादश भाव में हों तो जातक उच्च शिक्षा पाता है।
(आप अपनी कुण्डली में उक्त योगों को विचारकर शिक्षा संबंधी विश्लेषण कर सकते हैं।)

बच्चे का मूल स्वभाव जानकर ही शिक्षा दें..( अंक शास्त्र अनुसार)----

अंक ज्योतिष में मूलांक जन्म तारीख के अनुसार 1 से 9 माने जाते हैं। 

प्रत्येक अंक व्यक्ति का मूल स्वभाव दिखाता है। बच्चे का मूल स्वभाव जानकर ही माता-पिता उसे सही तालीम दे सकते हैं। आइए, जानें कैसा है आपके बच्चे का स्वभाव।

मूलांक 1 (1, 10 19, 28) : ये बच्चे क्रोधी, जिद्‍दी व अहंकारी होते हैं। अच्छे प्रशासनिक अधिकारी बनते हैं। ये तर्क के बच्चे हैं अत: डाँट-डपट नहीं सहेंगे। इन्हें तर्क से नहीं, प्यार से समझाएँ।

* मूलांक 2 (2, 11, 20, 29) : ये शांत, समझदार, भावुक व होशियार होते हैं। माता-पिता की सेवा करते हैं। जरा सा तेज बोलना इन्हें ठेस पहुँचाता है। इनसे शांति व समझदारी से बात करें।

* मूलांक 3 (3, 12, 21,30 ) : ये समझदार, ज्ञानी व घमंडी होते हैं। अच्‍छे सलाहकार बनते हैं। इन्हें समझाने के लिए पर्याप्त कारण व ज्ञान होना जरूरी है।

* मूलांक 4 (4, 13, 22) : बेपरवाह, खिलंदड़े व कारस्तानी होते हैं। रिस्क लेना इनका स्वभाव होता है। इन्हें अनुशासन में रखना जरूरी है। ये व्यसनाधीन हो सकते हैं।

* मूलांक 5 (5, 14, 23) : बुद्धिमान, शांत, आशावादी होते हैं। रिसर्च के कामों में रूचि लेते हैं। इनके साथ धैर्य से व शांति से बातचीत करें।

* मूलांक 6 (6, 15, 24) : हँसमुख, शौकीन मिजाज व कलाप्रेमी होते हैं। 'खाओ पियो ‍मस्त रहो' पर जीते हैं। इन्हें सही संस्कार व सही दिशा-निर्देश जरूरी है।

* मूलांक 7 (7, 16, 25) : भावुक, निराशावादी, तनिक स्वार्थी मगर तीव्र बुद्धि के होते हैं। व्यसनाधीन जल्दी होते हैं। कलाकार हो सकते हैं। इन्हें कड़े अनुशासन व सही मार्गदर्शन की जरूरत होती है।

* मूलांक 8 (8, 17, 26) : तनिक स्वार्थी, भावुक, अति व्यावहारिक, मेहनती व व्यापार बुद्धि वाले होते हैं। जीवन में देर से गति आती है। इन्हें सतत सहयोग व अच्छे साथियों की जरूरत होती है।

* मूलांक 9 (9, 18, 27) : ऊर्जावान, शैतान व तीव्र बुद्धि के विद्रोही होते हैं। माता-पिता से अधिक बनती नहीं है। प्रशासन में कुशल होते हैं। इनकी ऊर्जा को सही दिशा देना व इन्हें समझना जरूरी होता है।

व्यवसाय में सफलता का सटीक अध्ययन-----

शिक्षा पूर्ण होने के पश्चात अक्सर युवाओं के मन में यह दुविधा रहती है कि नौकरी या व्यवसाय में से उनके लिए उचित क्या होगा। इस संबंध में जन्मकुंडली का सटीक अध्ययन सही दिशा चुनने में सहायक हो सकता है।
* नौकरी या व्यवसाय देखने के लिए सर्वप्रथम कुंडली में दशम, लग्न और सप्तम स्थान के अधिपति तथा उन भावों में स्थित ग्रहों को देखा जाता है।
* लग्न या सप्तम स्थान बलवान होने पर स्वतंत्र व्यवसाय में सफलता का योग बनता है।
* प्रायः लग्न राशि, चंद्र राशि और दशम भाव में स्थित ग्रहों के बल के तुलनात्मक अध्ययन द्वारा व्यवसाय का निर्धारण करना उचित रहता है।
* प्रायः अग्नि तत्व वाली राशि (मेष, सिंह, धनु) के जातकों को बुद्धि और मानसिक कौशल संबंधी व्यवसाय जैसे कोचिंग कक्षाएँ, कन्सल्टेंसी, लेखन, ज्योतिष आदि में सफलता मिलती है।
* पृथ्वी तत्व वाली राशि (वृष, कन्या, मकर) के जातकों को शारीरिक क्षमता वाले व्यवसाय जैसे कृषि, भवन निर्माण, राजनीति आदि में सफलता मिलती है। 
जल तत्व वाली राशि (कर्क, वृश्चिक, मीन) के जातक प्रायः व्यवसाय बदलते रहते हैं। इन्हें द्रव, स्प्रिट, तेल, जहाज से भ्रमण, दुग्ध व्यवसाय आदि में सफलता मिल सकती है।
* वायु तत्व (मिथुन, तुला, कुंभ) प्रधान व्यक्ति साहित्य, परामर्शदाता, कलाविद, प्रकाशन, लेखन, रिपोर्टर, मार्केटिंग आदि के कामों में अपना हुनर दिखा सकते हैं।
* दशम स्थान में सूर्य हो : पैतृक व्यवसाय (औषधि, ठेकेदारी, सोने का व्यवसाय, वस्त्रों का क्रय-विक्रय आदि) से उन्नति होती है। ये जातक प्रायः सरकारी नौकरी में अच्छे पद पर जाते हैं।
* चन्द्र होने पर : जातक मातृ कुल का व्यवसाय या माता के धन से (आभूषण, मोती, खेती, वस्त्र आदि) व्यवसाय करता है।
* मंगल होने पर : भाइयों के साथ पार्टनरशिप (बिजली के उपकरण, अस्त्र-शस्त्र, आतिशबाजी, वकालत, फौजदारी) में व्यवसाय लाभ देता है। ये व्यक्ति सेना, पुलिस में भी सफल होते हैं।
* बुध होने पर : मित्रों के साथ व्यवसाय लाभ देता है। लेखक, कवि, ज्योतिषी, पुरोहित, चित्रकला, भाषणकला संबंधी कार्य में लाभ होता है।
* बृहस्पति होने पर : भाई-बहनों के साथ व्यवसाय में लाभ, इतिहासकार, प्रोफेसर, धर्मोपदेशक, जज, व्याख्यानकर्ता आदि कार्यों में लाभ होता है।
* शुक्र होने पर : पत्नी से धन लाभ, व्यवसाय में सहयोग। जौहरी का कार्य, भोजन, होटल संबंधी कार्य, आभूषण, पुष्प विक्रय आदि कामों में लाभ होता है।
शनि :- शनि अगर दसवें भाव में स्वग्रही यानी अपनी ही राशि का हो तो 36वें साल के बाद फायदा होता है। ऐसे जातक अधिकांश नौकरी ही करते हैं। अधिकतर सिविल या मैकेनिकल इंजीनियरिंग में जाते है। लेकिन अगर दूसरी राशि या शत्रु राशि का हो तो बेहद तकलीफों के बाद सफलता मिलती है। अधिकांश मामलों में कम स्तर के मशीनरी कामकाज से व्यक्ति जुदा हो जाता है।
राहू :- अचानक लॉटरी से, सट्‍टे से या शेयर से व्यक्ति को लाभ मिलता है। ऐसे जातक राजनीति में विशेष रूप सफल रहते हैं।
केतु :- केतु की दशम में स्थिति संदिग्ध मानी जाती है किंतु अगर साथ में अच्छे ग्रह हो तो उसी ग्रह के अनुसार फल मिलता है लेकिन अकेला होने या पाप प्रभाव में होने पर के‍तु व्यक्ति को करियर के क्षेत्र में डूबो देता है।


बहरहाल हम बात कर रहे हैं व्यक्ति के रोजगार(Profession) की. चाहे लाल-किताब हो अथवा वैदिक ज्योतिष, अधिकतर ज्योतिषी व्यक्ति के कार्यक्षेत्र, रोजगार के प्रश्न पर विचार करने के लिए जन्मकुंडली के दशम भाव (कर्म भाव) को महत्व देते हैं. वो समझते हैं कि जो ग्रह दशम स्थान में स्थित हो या जो दशम स्थान का अधिपति हो, वो इन्सान की आजीविका को बतलाता है. अब उनके अनुसार यह दशम स्थान सभी लग्नों से हो सकता है------
जन्मलग्न से, सूर्यलग्न से या फिर चन्द्रलग्न से, जिसके दशम में स्थित ग्रहों के स्वभाव-गुण आदि से मनुष्य की आजीविका का पता चलता है. जबकि ऎसा बिल्कुल भी नहीं होता. ये पूरी तरह से गलत थ्योरी है.

दशम स्थान को ज्योतिष में कर्म भाव कहा जाता है, जो कि दैवी विकासात्मक योजना (Evolutionary Plan) का एक अंग है.यहाँ कर्म से तात्पर्य इन्सान के नैतिक अथवा अनैतिक, अच्छे-बुरे, पाप-पुण्य आदि कर्मों से है. दूसरे शब्दों में इन कर्मों का सम्बन्ध धर्म से, भावना से तथा उनकी सही अथवा गलत प्रकृति से है न कि पैसा कमाने के निमित किए जाने वाले कर्म(रोजगार) से.

आइये जाने धन प्राप्ति/शिक्षा/रोजगार के कुछ खास/महत्वपूर्ण करक योग---

इंजीनियरिंग शिक्षा के कुछ योग - 

जन्म, नवांश या चन्द्रलग्न से मंगल चतुर्थ स्थान में हो या चतुर्थेश मंगल की राशि में स्थित हो। 
मंगल की चर्तुथ भाव या चतुर्थेश पर दृष्टि हो अथवा चतुर्थेश के साथ युति हो। 
मंगल और बुध का पारस्परिक परिवर्तन योग हो अर्थात मंगल बुध की राशि में हो अथवा बुध मंगल की राशि में हो। 

चिकित्सक (डाक्टर )शिक्षा के कुछ योग - 

जैमिनि सूत्र के अनुसार चिकित्सा से सम्बन्धित कार्यो में बुध और शुक्र का विशेष महत्व हैं। ’’शुक्रन्दौ शुक्रदृष्टो रसवादी (1/2/86)’’ - यदि कारकांश में चन्द्रमा हो और उस पर शुक्र की दृष्टि हो तो रसायनशास्त्र को जानने वाला होता हैं। ’’ बुध दृष्टे भिषक ’’ (1/2/87) - यदि कारकांश में चन्द्रमा हो और उस पर बुध की दृष्टि हो तो वैद्य होता हैं। 
जातक परिजात (अ.15/44) के अनुसार यदि लग्न या चन्द्र से दशम स्थान का स्वामी सूर्य के नवांश में हो तो जातक औषध या दवा से धन कमाता हैं। (अ.15/58) के अनुसार यदि चन्द्रमा से दशम में शुक्र - शनि हो तो वैद्य होता हैं। 
वृहज्जातक (अ.10/2) के अनुसार लग्न, चन्द्र और सूर्य से दशम स्थान का स्वामी जिस नवांश में हो उसका स्वामी सूर्य हो तो जातक को औषध से धनप्राप्ति होती हैं। उत्तर कालामृत (अ. 5 श्लो. 6 व 18) से भी इसकी पुष्टि होती हैं। 
फलदीपिका (5/2) के अनुसार सूर्य औषधि या औषधि सम्बन्धी कार्यो से आजीविका का सूचक हैं। यदि दशम भाव में हो तो जातक लक्ष्मीवान, बुद्धिमान और यशस्वी होता हैं (8/4) ज्योतिष के आधुनिक ग्रन्थों में अधिकांश ने चिकित्सा को सूर्य के अधिकार क्षेत्र में माना हैं और अन्य ग्रहों के योग से चिकित्सा - शिक्षा अथवा व्यवसाय के ग्रहयोग इस प्रकार बतलाए हैं - 
सूर्य एवं गुरू --- फिजीशियन
सूर्य एवं बुध --- परामर्श देने वाला फिजीशियन
सूर्य एवं मंगल --- फिजीशियन
सूर्य एवं शुक्र एवं गुरू --- मेटेर्निटी
सूर्य,शुक्र,मंगल, शनि---- वेनेरल
सूर्य एवं शनि ----- हड्डी/दांत सम्बन्धी
सूर्य एवंशुक्र , बुध ---- कान, नाक, गला
सूर्य एवं शुक्र $ राहु , यूरेनस ---- एक्सरे
सूर्य एवं युरेनस ---- शोध चिकित्सा
सूर्य एवं चन्द्र , बुध --- उदर चिकित्सा, पाचनतन्त्र
सूर्य एवंचन्द्र , गुरू --- हर्निया , एपेण्डिक्स
सूर्य एवं शनि (चतुर्थ कारक) --- टी0 बी0, अस्थमा
सूर्य एवं शनि (पंचम कारक) ---- फिजीशियन

न्यायाधीश बनने के कुछ योग - ---

यदि जन्मकुण्डली के किसी भाव में बुध-गुरू अथवा राहु-बुध की युति हो। 
यदि गुरू, शुक्र एवं धनेश तीनों अपने मूल त्रिकोण अथवा उच्च राशि में केन्द्रस्थ अथवा त्रिकोणस्थ हो तथा सूर्य मंगल द्वारा दृष्ट हो तो जातक न्यायशास्त्र का ज्ञाता होता हैं। 
यदि गुरू पंचमेश अथवा स्वराशि का हो और शनि व बुध द्वारा दृष्ट हो। 
यदि लग्न, द्वितीय, तृतीय, नवम्, एकादश अथवा केन्द्र में वृश्चिक अथवा मकर राशि का शनि हो अथवा नवम भाव पर गुरू-चन्द्र की परस्पर दृष्टि हो। 
यदि शनि से सप्तम में गुरू हो। 
यदि सूर्य आत्मकारक ग्रह के साथ राशि अथवा नवमांश में हो। 
यदि सप्तमेश नवम भाव में हो तथा नवमेश सप्तम भाव में हो। 
यदि तृतीयेश, षष्ठेश, गुरू तथा दशम भाव - ये चारों बलवान हो। 

शिक्षक के कुछ योग - 

यदि चन्द्रलग्न एवं जन्मलग्न से पंचमेश बुध, गुरू तथा शुक्र के साथ लग्न चतुर्थ, पंचम, सप्तम, नवम अथवा दशम भाव में स्थित हो। 
यदि चतुर्थेश चतुर्थ भाव में हो अथवा चतुर्थ भाव पर शुभ ग्रहों की दृष्टि हो अथवा चतुर्थ भाव में शुभ ग्रह स्थित हो। 
यदि पंचमेश स्वगृही, मित्रगृही, उच्चराशिस्थ अथवा बली होकर चतुर्थ, पंचम, सप्तम, नवम अथवा दशम भाव में स्थित हो और दशमेश का एकादशेश से सम्बन्ध हो। 
यदि पंचम भाव में सूर्य-मंगल की युति हो अथवा राहु, शनि, शुक्र में से कोई ग्रह पंचम भाव में बैठा हो और उस पर पापग्रह की दृष्टि भी हो तो जातक अंग्रेजी भाषा का विद्वान अथवा अध्यापक होता हैं।
यदि पंचमेश बुध, शुक्र से युक्त अथवा दृष्ट हो अथवा पंचमेश जिस भाव में हो उस भाव के स्वामी पर शुभग्रह की दृष्टि हो अथवा उसके दोनों ओर शुभग्रह बैठें हो। 
यदि बुध पंचम भाव में अपनी स्वराशि अथवा उच्चराशि में स्थित हो।
यदि द्वितीय भाव में गुरू या उच्चस्थ सूर्य, बुध अथवा शनि हो तो जातक विद्वान एवं सुवक्ता होता हैं। 
यदि बृहस्पति ग्रह चन्द्र, बुध अथवा शुक्र के साथ शुभ स्थान में स्थित होकर पंचम एवं दशम भाव से सम्बन्धित हो। 
सूर्य,चन्द्र और लग्न मिथुन,कन्या या धन राशि में हो व नवम तथा पंचम भाव शुभ व बली ग्रहों से युक्त हो ।

ज्योतिष शास्त्रीय ग्रन्थों में सरस्वती योग शारदा योग, कलानिधि योग, चामर योग, भास्कर योग, मत्स्य योग आदि विशिष्ट योगों का उल्लेख हैं। अगर जातक की कुण्डली में इनमे से कोई योग हो तो वह विद्वान अनेक शास्त्रों का ज्ञाता, यशस्वी एवं धनी होता है।

जानिए राशियों से जुड़े नौकरी और व्यवसाय—

1-मेष: – पुलिस अथवा सेना की नौकरी, इंजीनियंिरंग, फौजदारी का वकील, सर्जन, ड्राइविंग, घड़ी का कार्य, रेडियो व टी.वी. का निर्माण या मरम्मत, विद्युत का सामान, कम्प्यूटर, जौहरी, अग्नि सम्बन्धी कार्य, मेकेनिक, ईंटों का भट्टा, किसी फैक्ट्री में कार्य, भवन निर्माण सामग्री, धातु व खनिज सम्बन्धी कार्य, नाई, दर्जी, बेकरी का कार्य, फायरमेन, कारपेन्टर। 
2-वृषभ: – सौन्दर्य प्रसाधन, हीरा उद्योग, शेयर ब्रोकर, बैंक कर्मचारी, नर्सरी, खेती, संगीत, नाटक, फिल्म या टी.वी. कलाकार, पेन्टर, केमिस्ट, ड्रेस डिजाइनर, कृषि अथवा राजस्व विभाग की नौकरी, महिला विभाग, सेलटेक्स या आयकर विभाग की नौकरी, ब्याज से धन कमाने का कार्य, सजावट तथा विलासिता की वस्तुओं का निर्माण अथवा व्यापार, चित्रकारी, कशीदाकारी, कलात्मक वस्तुओं सम्बन्धी कार्य, फैशन, कीमती पत्थरों या धातु का व्यापार, होटल व बर्फ सम्बन्धी कारोबार। 
3-मिथुन: – पुस्तकालय अध्यक्ष, लेखाकार, इंजीनियर, टेलिफोन आपरेटर, सेल्समेन, आढ़तिया, शेयर ब्रोकर, दलाल, सम्पादक, संवाददाता, अध्यापक, दुकानदार, रोडवेज की नौकरी, ट्यूशन से जीविका कमाने वाला, उद्योगपति, सचिव, साईकिल की दुकान, अनुवादक, स्टेशनरी की दुकान, ज्योतिष, गणितज्ञ, लिपिक का कार्य, चार्टड एकाउन्टेंट, भाषा विशेषज्ञ, लेखक, पत्रकार, प्रतिलिपिक, विज्ञापन प्रबन्धन, प्रबन्धन (मेनेजमेन्ट) सम्बन्धी कार्य, दुभाषिया, बिक्री एजेन्ट।

4-कर्क: – जड़ी-बूटिंयों का व्यापार, किराने का सामान, फलों के जड़ पौध सम्बन्धी कार्य, रेस्टोरेन्ट, चाय या काफी की दुकान, जल व कांच से सम्बन्धित कार्य, मधुशाला, लांड्री, नाविक, डेयरी फार्म, जीव विज्ञान, वनस्सपति विज्ञान, प्राणी विज्ञान आदि से सम्बन्धित कार्य, मधु के व्यवसाय, सुगन्धित पदार्थ व कलात्मक वस्तुओं से सम्बन्धित कार्य, सजावट की वस्तुएं, अगरबत्ती, फोटोग्राफी, अभिनय, पुरातत्व इतिहास, संग्रहालय, शिक्षक, सामाजिक कार्यकर्ता या सामाजिक संस्थाओं के कर्मचारी, अस्पताल की नौकरी, जहाज की नौकरी, मौसम विभाग, जल विभाग या जल सेना की नौकरी, जनरल मर्चेन्ट। 
5-सिंह: – पेट्रोलियम, भवन निर्माण, चिकित्सक, राजनेता, औषधि निर्माण एवं व्यापार, कृषि से उत्पादित वस्तुएं, स्टाक एक्सचेंज, कपड़ा, रूई, कागज, स्टेशनरी आदि से सम्बन्धित व्यवसाय, जमीन से प्राप्त पदार्थ, शासक, प्रसाशक, अधिकारी, वन अधिकारी, राजदूत, सेल्स मैनेजर, ऊन के गरम कपड़ों का व्यापार, फर्नीचर व लकड़ी का व्यापार, फल व मेवों का व्यापार, पायलेट, पेतृक व्यवसाय। 
6-कन्या: – अध्यापक, दुकान, सचिव, रेडियो या टी.वी. का उद्घोषक, ज्योतिष, डाक सेवा, लिपिक, बैकिंग, लेखा सम्बन्धी कार्य, स्वागतकर्ता, मैनेजर, बस ड्रायवर और संवाहक, जिल्दसाज, आशुलिपिक, अनुवादक, पुस्तकालय अध्यक्ष, कागज के व्यापारी, हस्तलेख और अंगुली के विशेषज्ञ, मनोवैज्ञानिक, अन्वेषक, सम्पादक, परीक्षक, कर अधिकारी, सैल्स मेन, शोध कार्य पत्रकारिता आदि। 
7-तुला: – न्यायाधीश, मजिस्ट्रेट, परामर्शदाता, फिल्म या टी.वी. से सम्बन्ध, फोटोग्राफर, फर्नीचर की दुकान, मूल्यवान वस्तुओं का विनिमय, धन का लेन-देन, नृत्य-संगीत या चित्रकला से सम्बन्धित कार्य, साज-सज्जा, अध्यापक, बैंक क्लर्क, एजेन्सी, दलाली, विलासिता की वस्तुएं, राजनेता, जन सम्पर्क अधिकारी, फैशन मॉडल, सामाजिक कार्यकर्ता, रेस्तरां का मालिक, चाय या काफी की दुकान, मूर्तिकार, कार्टूनिस्ट, पौशाक का डिजाइनर, मेकअप सहायक, केबरे प्रदर्शन। 
8-वृश्चिक: – केमिस्ट, चिकित्सक, वकील, इंजीनियर, भवन निर्माण, टेलीफोन व बिजली का सामान, रंग, सीमेन्ट, ज्योतिषी और तांत्रिक, जासूसी का काम करने वाला, दन्त चिकित्सक, मेकेनिक, ठेकेदार, जीवन बीमा एजेन्ट, रेल या ट्रक कर्मचारी, पुलिस और सेना के कर्मचारी, टेलिफोन आपरेटर, समुद्री खाद्यान्नों के व्यापारी, गोता लगाकर मोती निकालने का काम, होटय या रेस्टोरेन्ट, चोरी या डकैती, शराब की फैक्ट्री, वर्कशाप का कार्य, कल-पुर्जो की दुकान या फैैक्ट्री, लोहे या स्टील का कार्य, तम्बाकू या सिगरेट का कार्य, नाई, मिष्ठान की दुकान, फायर बिग्रेड की नौकरी। 
9-धनु: – बैंक की नौकरी, अध्यापन, किसी धार्मिक स्थान से सम्बन्ध, ऑडिट का कार्य, कम्पनी सेकेट्री, ठेकेदार, सट्टा व्यापार, प्रकाशक, विज्ञापन से सम्बन्धित कार्य, सेल्समेन, सम्पादक, शिक्षा विभाग में कार्य, लेखन, वकालात या कानून सम्बन्धी कार्य, उपदेशक, न्यायाधीश, धर्म-सुधारक, कमीशन ऐजेन्ट, आयात-निर्यात सम्बन्धी कार्य, प्रशासनाधिकारी, पशुओं से उत्पन्न वस्तुओं का व्यापार, चमड़े या जूते के व्यापारी, घोड़ों के प्रशिक्षक, ब्याज सम्बन्धी कार्य, स्टेशनरी विक्रेता। 
10-मकर: – नेवी की नौकरी, कस्टम विभाग का कार्य, बड़ा व्यापार या उच्च पदाधिकारी, समाजसेवी, चिकित्सक, नर्स, जेलर या जेल से सम्बन्धित कार्य, संगीतकार, ट्रेवल एजेन्ट, पेट्रोल पम्प, मछली का व्यापार, मेनेजमेन्ट, बीमा विभाग, ठेकेदारी, रेडिमेड वस्त्र, प्लास्टिक, खिलौना, बागवानी, खान सम्बन्धी कार्य, सचिव, कृषक, वन अधिकारी, शिल्पकार, फैक्ट्री या मिल कारीगर, सभी प्रकार के मजदूर। 
11 -कुम्भ: – शोध कार्य, शिक्षण कार्य, ज्योतिष, तांत्रिक, प्राकृतिक चिकित्सक, इंजीनियर या वैज्ञानिक, दार्शनिक, एक्स-रे कर्मचारी, चिकित्सकीय उपकरणों के विक्रेता, बिजली अथवा परमाणु शक्ति से सम्बन्धित कार्य, कम्प्यूटर, वायुयान, वैज्ञानिक, दूरदर्शन टैक्नोलोजी, कानूनी सलाहकार, मशीनरी सम्बन्धी कार्य, बीमा विभाग, ठेकेदार, लोहा, तांबा, कोयला व ईधन के विक्रेता, चौकीदार, शव पेटिका और मकबरा बनाने वाले, चमड़े की वस्तुओं का व्यापार। 
12 -मीन: – लेखन, सम्पादन, अध्यापन कार्य, लिपिक, दलाली, मछली का व्यापार, कमीशन एजेन्ट, आयात-निर्यात सम्बन्धी कार्य, खाद्य पदार्थ या मिष्ठान सम्बन्धी कार्य, पशुओं से उत्पन्न वस्तुओं का व्यापार, फिल्म निर्माण, सामाजिक कार्य, संग्रहालय या पुस्तकालय का कार्य, संगीतज्ञ, यात्रा एजेन्ट, पेट्रोल और तेल के व्यापारी, समुद्री उत्पादों के व्यापारी, मनोरंजन केन्द्रों के मालिक, चित्रकार या अभिनेता, चिकित्सक, सर्जन, नर्स, जेलर और जेल के कर्मचारी, ज्योतिषी, पार्षद, वकील, प्रकाशक, रोकड़िया, तम्बाकू और किराना का व्यापारी, साहित्यकार।